मुख्य सामग्री पर जाएं
नवदुर्गा स्तोत्र

नवदुर्गा स्तोत्रम्— अर्थ, लाभ एवं पाठ विधि सहित

Navdurga Stotram

माँ भगवती दुर्गा के नौ पावन स्वरूपों (शैलपुत्री से सिद्धिदात्री) की वंदना करने वाला श्री नवदुर्गा स्तोत्रम् जीवन के समस्त भय, संकट और व्याधियों का नाश कर अष्ट सिद्धियाँ और सर्वमनोकामना पूर्ति प्रदान करता है।

परंपरागत (मार्कण्डेय पुराण / दुर्गा सप्तशती परंपरा)५ मिनट पाठ

नवदुर्गा स्तोत्रम् संपूर्ण पाठ

पावन श्लोक सरल हिंदी भावार्थ सहित

श्लोक १

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् ।

वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ॥ १ ॥

अर्थ: हे माँ शैलपुत्री! अपने समस्त मनोवांछित फलों और आध्यात्मिक कामनाओं की सिद्धि हेतु मैं आपके पावन चरणों में वंदना करता हूँ। अपने मस्तक पर अर्धचंद्र का दिव्य मुकुट धारण करने वाली, वृषभ (नंदी बैल) पर आरूढ़ और हाथ में त्रिशूल धारण करने वाली परम यशस्विनी हे पर्वतराज हिमालय की पुत्री माँ शैलपुत्री! आपको मेरा कोटि-कोटि नमन है।

श्लोक २

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू ।

देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ॥ २ ॥

अर्थ: अपने कमल के समान सुंदर दोनों हाथों में रुद्राक्ष की जपमाला और कमंडलु धारण करने वाली, कठोर तप और ब्रह्मचर्य की साक्षात् मूर्ति हे सर्वोत्कृष्ट देवी ब्रह्मचारिणी! आप मुझ पर सदा प्रसन्न और कृपालु रहें तथा मुझे विद्या, तप और संयम का पावन वरदान प्रदान करें।

श्लोक ३

पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता ।

प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ॥ ३ ॥

अर्थ: श्रेष्ठ पराक्रमी सिंह पर सवार होने वाली, दुष्टों व दैत्यों के संहार हेतु प्रचंड क्रोध और विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों से सुशोभित, घंटे के आकार का अर्धचंद्र धारण करने के कारण संसार में 'चन्द्रघण्टा' नाम से विख्यात हे करुणामयी माँ! आप मुझ भक्त पर अपनी असीम कृपा और आशीर्वाद का विस्तार करें।

श्लोक ४

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च ।

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥ ४ ॥

अर्थ: अपनी मंद और दिव्य मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना करने वाली, अपने दोनों कर-कमलों में अमृत व शक्ति से भरा कलश धारण करने वाली हे माँ कूष्माण्डा! आप मेरे जीवन में सदा समस्त शुभता, आरोग्य, तेज और परम ऐश्वर्य प्रदान करने वाली हों।

श्लोक ५

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया ।

शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ॥ ५ ॥

अर्थ: दिव्य सिंहासन पर नित्य विराजमान रहने वाली, अपनी दोनों भुजाओं में कमल पुष्प धारण करने वाली तथा अपनी गोद में भगवान स्कन्द (कार्तिकेय जी) को विराजित रखने वाली परम यशस्विनी हे माँ स्कन्दमाता! आप मुझ पर सदैव अपनी शुभ और मंगलमयी कृपा बनाए रखें।

श्लोक ६

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना ।

कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ॥ ६ ॥

अर्थ: हाथ में चंद्रहास नामक दिव्य व उज्ज्वल खड्ग (तलवार) धारण करने वाली, भव्य सिंह की सवारी करने वाली और महिषासुर आदि दानवों का संहार करने वाली महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रकट हे देवी कात्यायनी! आप मुझे जीवन में सर्वत्र विजय, निर्भयता और शुभ फल प्रदान करें।

श्लोक ७

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता ।

लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ॥

वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा ।

वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी ॥ ७ ॥

अर्थ: सिर पर एक वेणी (खुले केश), कानों में जवाकुसुम के कर्णफूल धारण करने वाली, गर्दभ पर सवार, घने अंधकार के समान कृष्ण वर्ण और शत्रुओं के लिए अत्यंत भयंकर रूप वाली हे माँ कालरात्रि! आपका बायाँ पैर लोहे के आभूषण से सुशोभित है। दुष्टों का नाश और भक्तों को अभय तथा शुभ फल देने के कारण 'शुभंकरी' नाम से पूजित हे माँ! आप मेरे समस्त भय, संकट और नकारात्मक शक्तियों का समूल विनाश करें।

श्लोक ८

श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः ।

महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ॥ ८ ॥

अर्थ: श्वेत वृषभ पर सवार होने वाली, श्वेत वस्त्र और आभूषण धारण करने वाली, परम पवित्र और करुणामयी, देवाधिदेव महादेव शिव जी को परम आनंद प्रदान करने वाली हे माँ महागौरी! आप मेरे जीवन के समस्त पापों और संतापों को धोकर मुझे सुख, शांति और परम मंगल प्रदान करें।

श्लोक ९

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि ।

सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ॥ ९ ॥

अर्थ: सिद्ध, गंधर्व, यक्ष, ऋषि-मुनि, देवता और असुरों द्वारा जिनके युगल चरणों की नित्य सेवा-पूजा की जाती है, जो अणिमा, महिमा आदि समस्त अष्ट सिद्धियों और नवनिधियों को देने वाली हैं — वे भगवती सिद्धिदात्री मुझ पर सदा प्रसन्न रहें और मेरी समस्त मनोकामनाओं को सिद्ध करें।

श्री नवदुर्गा स्तोत्रम् का महत्व एवं परिचय

सनातन धर्म की शाक्त परंपरा में भगवती आद्याशक्ति माँ दुर्गा को समस्त सृष्टि की मूल चेतना, संहारिणी एवं पालिनी शक्ति माना गया है। माँ दुर्गा का प्राकट्य ब्रह्मांड से अंधकार, अधर्म और राक्षसी प्रवृत्तियों का समूल नाश कर धर्म व सत्य की पुनर्स्थापना के लिए हुआ। मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत ‘देवी कवच’ और ‘दुर्गा सप्तशती’ की पावन परंपरा में देवी के नौ विशिष्ट स्वरूपों का वर्णन मिलता है, जिन्हें नवदुर्गा (Navadurga) कहा जाता है। श्री नवदुर्गा स्तोत्रम् (Navdurga Stotram) देवी के इन्हीं नौ अलौकिक स्वरूपों का एक अत्यंत दुर्लभ, फलदायी और सिद्ध ध्यान-स्तोत्र है।

इस पावन स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें नवरात्रि के नौ दिनों में पूजित होने वाली प्रत्येक देवी के दिव्य रूप, वाहन, आयुध, मुद्रा और उनके वरदान देने वाले स्वभाव का क्रमबद्ध ध्यान समाहित है:

  1. माँ शैलपुत्री: हिमालय राज की पुत्री, जो जीवन में स्थिरता, भक्ति और दृढ़ संकल्प प्रदान करती हैं।
  2. माँ ब्रह्मचारिणी: तप और संयम की अधिष्ठात्री, जो ज्ञान, वैराग्य और विद्या की सिद्धि देती हैं।
  3. माँ चन्द्रघण्टा: परम शांतिदायिनी और पराक्रमी, जो भक्तों के कष्टों का निवारण कर साहस देती हैं।
  4. माँ कूष्माण्डा: मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना करने वाली, जो आरोग्य, तेज और आयु की वृद्धि करती हैं।
  5. माँ स्कन्दमाता: भगवान कार्तिकेय की माता, जो वात्सल्य, मोक्ष और पारिवारिक सुख का संचार करती हैं।
  6. माँ कात्यायनी: महिषासुरमर्दिनी, जो शत्रुओं, भय और बाधाओं का नाश कर अभीष्ट सिद्धि देती हैं।
  7. माँ कालरात्रि: घोर अंधकार और काल का नाश करने वाली शुभंकरी, जो भयमुक्त जीवन और बुरी शक्तियों से रक्षा करती हैं।
  8. माँ महागौरी: परम उज्ज्वल, शांत और करुणामयी, जो पापों का प्रक्षालन कर पवित्रता प्रदान करती हैं।
  9. माँ सिद्धिदात्री: समस्त अष्ट सिद्धियों और नवनिधियों की दात्री, जो साधक को पूर्णता और परमानंद प्रदान करती हैं।

जो भक्त प्रतिदिन अथवा विशेष रूप से नवरात्रि के पावन पर्व पर इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे माँ जगदम्बा की संपूर्ण नौ शक्तियों का संयुक्त आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे उसके जीवन की कोई भी इच्छा अपूर्ण नहीं रहती।

श्री नवदुर्गा स्तोत्रम् पाठ करने की सही विधि एवं नियम

माँ भगवती दुर्गा की आराधना में आंतरिक पवित्रता, श्रद्धा और निष्काम शरणागति का सर्वाधिक महत्व है। नवदुर्गा स्तोत्रम् का पूर्ण पुण्यफल प्राप्त करने हेतु निम्नलिखित शास्त्रसम्मत विधि एवं नियमों का पालन करना चाहिए:

  1. शुभ दिन एवं समय: इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन प्रातः अथवा सायंकाल किया जा सकता है। विशेष रूप से चैत्र एवं शारदीय नवरात्रि, प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष की दुर्गाष्टमी, महानवमी तथा शुक्रवार व मंगलवार के दिन इसका पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
  2. शारीरिक एवं मानसिक शुद्धि: स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ लाल अथवा पीले वस्त्र धारण करें। मन को शांत और एकाग्र कर पूजा स्थान पर बैठें।
  3. दिशा एवं आसन: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा, ऊन अथवा लाल रंग के स्वच्छ आसन पर बैठें।
  4. दीप एवं वेदी स्थापना: माँ दुर्गा की प्रतिमा अथवा चित्र के समक्ष शुद्ध गाय के घी का या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें। धूप और अगरबत्ती जलाकर वातावरण को सुगंधित करें।
  5. पूजन सामग्री: माँ को रोली, अक्षत, लाल पुष्प (विशेष रूप से गुड़हल या लाल गुलाब) अर्पित करें। भोग के रूप में मिश्री, ऋतुफल, हलवा अथवा पंचमेवा का नैवेद्य लगाएं।
  6. पाठ का क्रम: आचमन और प्राणायाम के उपरांत सर्वप्रथम भगवान गणेश जी का स्मरण करें। इसके पश्चात हाथ में जल या पुष्प लेकर संकल्प लें और अत्यंत शुद्ध, स्पष्ट व मधुर वाणी में नवदुर्गा स्तोत्रम् के सभी नौ श्लोकों का लयबद्ध पाठ करें। अंत में माँ दुर्गा की आरती कर क्षमा प्रार्थना करें।

श्री नवदुर्गा स्तोत्रम् पाठ के अद्भुत लाभ एवं महत्व

श्री नवदुर्गा स्तोत्रम् केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि देवी के नौ चक्रों और नौ दिव्य शक्तियों को जाग्रत करने वाला महामंत्र-स्तोत्र है। इस स्तोत्र की प्रत्येक पंक्ति साधक के जीवन में विशेष रूपांतरण लाती है:

  • मनोवांछित फलों और संकल्पों की सिद्धि: प्रथम श्लोक में उद्घोष है — ‘वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्, वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्’. माँ शैलपुत्री के ध्यान से साधक के अंतर्मन में दृढ़ता आती है और उसकी सभी सात्विक मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
  • तप, एकाग्रता और ज्ञान-विद्या की वृद्धि: द्वितीय श्लोक में प्रार्थना की गई है — ‘दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू, देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा’. माँ ब्रह्मचारिणी के अनुग्रह से विद्यार्थियों, साधकों और जिज्ञासुओं को एकाग्रता, उत्कृष्ट विद्या और नैतिक संयम की प्राप्ति होती है।
  • घोर संकटों, भय और शत्रुओं पर विजय: षष्ठ श्लोक में वर्णन है — ‘चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना, कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी’. माँ कात्यायनी और माँ कालरात्रि के प्रभाव से साधक तंत्र-मंत्र, नजर-दोष, ग्रह-पीड़ा और गुप्त शत्रुओं के भय से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।
  • आरोग्य, तेज और दीर्घायु का वरदान: चतुर्थ श्लोक में वंदना है — ‘सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च, दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे’. माँ कूष्माण्डा की कृपा से साधक का शारीरिक तेज बढ़ता है, असाध्य रोग शांत होते हैं और जीवन में उत्साह का संचार होता है।
  • अष्ट सिद्धियाँ एवं मोक्ष की प्राप्ति: नवम श्लोक का फलश्रुति वचन है — ‘सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि, सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी’. माँ सिद्धिदात्री के चरण-कमलों का ध्यान करने से साधक को लौकिक ऐश्वर्य के साथ-साथ आत्मज्ञान और परम मोक्ष की प्राप्ति होती है।

माँ दुर्गा के अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)

माँ जगदम्बा दुर्गा की संपूर्ण कृपा, रक्षा एवं भक्ति प्राप्त करने हेतु चालीसा सागर पर उपलब्ध इन पावन पाठों का भी नित्य लाभ उठाएं:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र.नवदुर्गा श्लोक क्या है और इसका नित्य पाठ कैसे करें?

नवदुर्गा श्लोक में माँ भगवती दुर्गा के नौ पावन रूपों (शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री) के ध्यान व वंदना के नौ दिव्य श्लोक समाहित हैं। नवरात्रि के दिनों में अथवा प्रत्येक शुक्रवार को शुद्ध मन से इन श्लोकों का पाठ करने से भय, रोग और ग्रह दोष दूर होकर सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

प्र.नवदुर्गा स्तोत्रम् का पाठ कब और किस समय करना सर्वाधिक फलदायी माना जाता है?

श्री नवदुर्गा स्तोत्रम् का पाठ विशेष रूप से चैत्र एवं शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में, प्रत्येक माह की दुर्गाष्टमी, महानवमी और शुक्रवार को करना परम कल्याणकारी माना गया है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में या सायंकाल देवी की आरती के समय शुद्ध घी का दीपक जलाकर इसका पाठ करने से माँ जगदम्बा की अमोघ कृपा प्राप्त होती है।

प्र.नवदुर्गा स्तोत्रम् में माँ दुर्गा के किन नौ स्वरूपों की स्तुति की गई है?

इस स्तोत्र में देवी के नौ दिव्य स्वरूपों — प्रथम शैलपुत्री, द्वितीय ब्रह्मचारिणी, तृतीय चन्द्रघण्टा, चतुर्थ कूष्माण्डा, पञ्चम स्कन्दमाता, षष्ठ कात्यायनी, सप्तम कालरात्रि, अष्टम महागौरी तथा नवम सिद्धिदात्री की क्रमशः स्तुति और ध्यान किया गया है। जैसा कि फलश्रुति में वर्णित है — 'सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी', नवम स्वरूप सिद्धिदात्री साधक को समस्त लौकिक व पारलौकिक सिद्धियाँ प्रदान करता है।

प्र.नवदुर्गा स्तोत्रम् के नित्य पाठ से भक्तों को क्या लाभ प्राप्त होते हैं?

नवदुर्गा स्तोत्रम् का नियमित पाठ करने से साधक को नवग्रहों के दोषों से मुक्ति, आरोग्य, मानसिक शांति और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। देवी के नौ स्वरूप जीवन के नौ प्रमुख आयामों (साहस, ज्ञान, शांति, तेज, वात्सल्य, विजय, निर्भयता, शुचिता और सिद्धि) का वरदान प्रदान कर परिवार में सुख-समृद्धि का संचार करते हैं।

प्र.क्या इस स्तोत्र का पाठ सामान्य गृहस्थ साधक भी कर सकते हैं और इसके नियम क्या हैं?

हाँ, नवदुर्गा स्तोत्रम् का पाठ कोई भी निष्ठावान भक्त और गृहस्थ कर सकता है। इसके लिए किसी गूढ़ तंत्र दीक्षा की आवश्यकता नहीं है। केवल शारीरिक शुद्धि (स्नान, स्वच्छ वस्त्र), पूर्व या उत्तर मुख होकर कुशा के आसन पर बैठना, और शुद्ध मन से देवी के प्रति वात्सल्य व शरणागति का भाव होना ही इस पाठ का मूल नियम है।

Free PDF DownloadA4 प्रिंटेबल

📄 नवदुर्गा स्तोत्रम् PDF डाउनलोड करें

नित्य पूजा एवं पाठ हेतु उच्च गुणवत्ता वाली प्रिंटेबल PDF (पावन श्लोक सरल हिंदी भावार्थ सहित)