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काल भैरव स्तोत्र (Kal Bhairav Stotra — पावन श्लोक सरल हिंदी भावार्थ सहित)
काल भैरव स्तोत्र— अर्थ, लाभ एवं पाठ विधि सहित
Kal Bhairav Stotra
रुद्रयामल तंत्रोक्त यह पावन श्री आपदुद्धारक काल भैरव स्तोत्र समस्त भय, रोग, शत्रु बाधा और जीवन की घोर विपत्तियों का समूल नाश करने वाला दिव्य रक्षा-कवच है।
काल भैरव स्तोत्र संपूर्ण पाठ
पावन श्लोक सरल हिंदी भावार्थ सहित
वन्दे बालं स्फटिकसदृशं कुण्डलोद्भासिवक्त्रं
दिव्याकल्पैर्नवमणिमयैः किङ्किणीनूपुराढ्यैः ।
दीप्ताकारं विशदवदनं सुप्रसन्नं त्रिनेत्रं
हस्ताग्राभ्यां वटुकमनिशं शूलदण्डौ दधानम् ॥
अर्थ: मैं उन बालस्वरूप भगवान बटुक भैरव की नित्य वंदना करता हूँ, जिनका दिव्य विग्रह शुद्ध स्फटिक मणि के समान श्वेत व उज्ज्वल है, जिनके मुखमंडल पर कुंडलों की अलौकिक आभा जगमगा रही है, जो नवरत्नों के आभूषणों, करधनी की घुंघरुओं और नूपुरों से सुशोभित हैं। तीन नेत्रों वाले, अत्यंत प्रसन्नमुख, दिव्य तेज से दीप्तिमान और अपने दोनों हाथों में त्रिशूल व दंड धारण करने वाले कृपामयी बटुक भैरव देव मेरी रक्षा करें।
ॐ ह्रीं भैरवो भूतनाथश्च भूतात्मा भूतभावनः ।
क्षेत्रज्ञः क्षेत्रपालश्च क्षेत्रज्ञः क्षत्रियो विराट् ॥ १ ॥
अर्थ: वे परम प्रभु ह्रीं-बीज-स्वरूप 'भैरव' (समस्त भयों का नाश करने वाले), 'भूतनाथ' (समस्त प्राणियों व भूतादि के स्वामी), 'भूतात्मा' (सभी जीवों में आत्मरूप से विद्यमान) और 'भूतभावन' (सृष्टि के समस्त जीवों की उत्पत्ति व पोषण करने वाले) हैं। वे ही अंतःकरण के ज्ञाता 'क्षेत्रज्ञ', तीर्थों व पवित्र स्थलों के रक्षक 'क्षेत्रपाल', क्षत्रिय-तेज से युक्त धर्मरक्षक 'क्षत्रिय' तथा संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त 'विराट' स्वरूप हैं।
श्मशानवासी मांसाशी खर्पराशी स्मरान्तकः ।
रक्तपः पानपः सिद्धः सिद्धिदः सिद्धसेवितः ॥ २ ॥
अर्थ: वे मोह-माया के विनाशक 'श्मशानवासी', नकारात्मक आसुरी वृत्तियों का भक्षण करने वाले, हाथ में खर्पर धारण करने वाले और कामदेव के दर्प को चूर करने वाले 'स्मरान्तक' हैं। वे दुष्टों के मद का पान करने वाले, नित्य सिद्ध, साधकों को मनोवांछित फल देने वाले 'सिद्धिद' तथा उच्च कोटि के सिद्ध योगियों द्वारा पूजित व सेवित हैं।
कङ्कालः कालशमनः कलाकाष्ठातनुः कविः ।
त्रिनेत्रो बहुनेत्रश्च तथा पिङ्गललोचनः ॥ ३ ॥
अर्थ: वे अस्थिमाला धारण करने वाले 'कंकाल', काल व अकाल मृत्यु का भी शमन करने वाले 'कालशमन', समय की सूक्ष्मतम कला-काष्ठा के रूप में स्थित 'कलाकाष्ठातनु' और परम ज्ञानी 'कवि' हैं। वे भूत, भविष्य और वर्तमान को देखने वाले 'त्रिनेत्र', सर्वद्रष्टा 'बहुनेत्र' तथा दुष्टों को भस्म करने वाली तेजस्वी पिंगल (लाल-पीली) आंखों वाले हैं।
शूलपाणिः खड्गपाणिः कङ्काली धूम्रलोचनः ।
अभीरुर्भरवीनाथो भूतपो योगिनीपतिः ॥ ४ ॥
अर्थ: वे अपने पावन हाथों में त्रिशूल धारण करने वाले 'शूलपाणि', तीक्ष्ण तलवार धारण करने वाले 'खड्गपाणि', कंकाल-स्वरूप और धूम्रवर्ण नेत्रों वाले हैं। वे स्वयं परम निर्भय 'अभीरु', पराशक्ति माँ भैरवी के प्रिय आराध्य 'भैरवीनाथ', समस्त पंचमहाभूतों के अधिपति 'भूतप' और चौंसठ योगिनियों के स्वामी 'योगिनीपति' हैं।
धनदोऽधनहारी च धनवान् प्रीतिवर्धनः ।
नागहारो नागकेशो व्योमकेशः कपालभृत् ॥ ५ ॥
अर्थ: वे भक्तों को विपुल ऐश्वर्य देने वाले 'धनद', दरिद्रता व दुर्भाग्य का समूल हरण करने वाले 'अधनहारी', स्वयं परम ऐश्वर्यशाली और भक्तों के प्रति वात्सल्य बढ़ाने वाले 'प्रीतिवर्धन' हैं। वे गले में सर्पों का हार धारण करने वाले, सर्प रूपी केशों वाले, आकाश रूपी जटाओं वाले 'व्योमकेश' और हाथ में कपाल धारण करने वाले 'कपालभृत्' हैं।
कालः कपालमाली च कमनीयः कलानिधिः ।
त्रिलोचनो ज्वलन्नेत्रस्त्रिशिखी च त्रिलोकभृत् ॥ ६ ॥
अर्थ: वे महाकाल स्वरूप 'काल', मुंडमाला व कपालमाला से सुशोभित, भक्तों के लिए अत्यंत सुंदर व मनोहारी 'कमनीय' तथा चौंसठ कलाओं के भंडार 'कलानिधि' हैं। वे प्रज्वलित अग्निशिखा के समान तेजस्वी नेत्रों वाले, त्रिशूलधारी और तीनों लोकों का भरण-पोषण व रक्षा करने वाले 'त्रिलोकभृत्' हैं।
त्रिनेत्रतनयो डिम्भः शान्तः शान्तजनप्रियः ।
बटुको बटुवेशश्च खट्वाङ्गवरधारकः ॥ ७ ॥
अर्थ: वे देवाधिदेव त्रिनेत्र शिव जी के अंश रूप 'त्रिनेत्रतनय', बालक रूप 'डिम्भ', शांत स्वरूप और शांतचित्त भक्तों को अत्यंत प्रिय लगने वाले 'शान्तजनप्रिय' हैं। वे दिव्य ब्रह्मचारी रूप 'बटुक', बटु वेषधारी तथा अपने हाथ में श्रेष्ठ खट्वांग (अस्त्र) धारण करने वाले हैं।
भूताध्यक्षः पशुपतिर्भिक्षुकः परिचारकः ।
धूर्तो दिगम्बरः शूरो हरिणः पाण्डुलोचनः ॥ ८ ॥
अर्थ: वे समस्त दृश्य-अदृश्य गणों के स्वामी 'भूताध्यक्ष', समस्त जीवों के रक्षक 'पशुपति', संन्यास भाव से भिक्षाटन करने वाले और भक्तों की सेवा में तत्पर रहने वाले हैं। वे मायावी असुरों की चालों को विफल करने में चतुर, दिशाओं को वस्त्र रूप में धारण करने वाले 'दिगंबर', अजेय 'शूरवीर' और सुंदर दृष्टि वाले प्रभु हैं।
प्रशान्तः शान्तिदः शुद्धः शङ्करप्रियबान्धवः ।
अष्टमूर्तिर्निधीशश्च ज्ञानचक्षुस्तपोमयः ॥ ९ ॥
अर्थ: वे परम प्रशांत, भक्तों को आंतरिक शांति प्रदान करने वाले 'शान्तिद', सर्वथा निर्मल 'शुद्ध' और भगवान शिव के परम आत्मीय 'शंकरप्रियबांधव' हैं। वे पृथ्वी-जल-अग्नि आदि आठ रूपों में स्थित 'अष्टमूर्ति', नव निधियों के स्वामी 'निधीश', ज्ञानरूपी दिव्य नेत्रों वाले और तपस्या के साक्षात विग्रह 'तपोमय' हैं।
अष्टाधारः षडाधारः सर्पयुक्तः शिखीसखः ।
भूधरो भूधराधीशो भूपतिर्भूधरात्मजः ॥ १० ॥
अर्थ: वे योग के अष्टांग व षट्चक्रों के आधार हैं, सर्पों से सुशोभित हैं, अग्निदेव के समान तेजस्वी मित्र हैं। वे समस्त पृथ्वी को धारण करने वाले 'भूधर', पर्वतों के अधिपति, संपूर्ण भूमंडल के स्वामी 'भूपति' तथा अविनाशी स्वरूप हैं।
कङ्कालधारी मुण्डी च नागयज्ञोपवीतवान् ।
जृम्भणो मोहनः स्तम्भी मारणः क्षोभणस्तथा ॥ ११ ॥
अर्थ: वे कंकाल धारण करने वाले, मुंडों से शोभित और सर्प का पावन यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने वाले हैं। वे साधक के आंतरिक शत्रुओं (काम, क्रोध, मद) तथा बाह्य दुष्टों का स्तम्भन, मोहन और शमन करने वाले पराक्रमी देव हैं।
शुद्धनीलाञ्जनप्रख्यो दैत्यहा मुण्डभूषितः ।
बलिभुग् बलिभुङ्नाथो बालोऽबालपराक्रमः ॥ १२ ॥
अर्थ: वे शुद्ध नीले काजल अथवा नीलमणि के समान मनोहारी कांति वाले, असुरों व दैत्यों का संहार करने वाले 'दैत्यहा' और मुंडमाला से अलंकृत हैं। वे पवित्र पूजा-बलि (नैवेद्य) स्वीकार करने वाले, भले ही बालक रूप 'बाल' दिखाई देते हों किंतु उनका पराक्रम संपूर्ण ब्रह्मांड को हिला देने वाला 'अबालपराक्रम' है।
सर्वापत्तौ तारणो दुर्गो दुष्टभूतनिषेवितः ।
कामी कलानिधिः कान्तः कामिनीवशकृद् वशी ॥ १३ ॥
अर्थ: वे जीवन के सभी कठिन संकटों से पार लगाने वाले 'सर्वापत्तौ तारण', दुर्गम से दुर्गम कार्यों को सुगम बनाने वाले 'दुर्ग' और दुष्ट शक्तियों को भी अपने वश में रखने वाले हैं। वे परम तेजस्वी, सर्व-आकर्षक और अपनी समस्त इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखने वाले 'वशी' हैं।
जगद्रक्षाकरोऽनन्तो मायामन्त्रौषधीमयः ।
सर्वसिद्धिप्रदो वैद्यः प्रभविष्णुरितीव हि ॥ १४ ॥
अर्थ: वे संपूर्ण जगत की चौबीसों घंटे रक्षा करने वाले 'जगद्रक्षाकर', नित्य अविनाशी 'अनंत', समस्त माया, गुप्त मंत्रों और दिव्य औषधियों के मूल अधिष्ठाता हैं। वे साधक को समस्त लौकिक व पारलौकिक सिद्धियां देने वाले 'सर्वसिद्धिप्रद', भव-रोगों के परम चिकित्सक 'वैद्य' और सर्वसमर्थ स्वामी हैं।
अष्टोत्तरशतं नाम्नां भैरवस्य महात्मनः ।
मया ते कथितं देवि रहस्यं सर्वकामदम् ॥ १५ ॥
अर्थ: भगवान शिव माँ पार्वती से कहते हैं — हे देवि! इस प्रकार मैंने महात्मा भगवान भैरव के १०८ परम पावन और गोपनीय नामों का यह अलौकिक स्तोत्र तुम्हें सुनाया है, जो साधक की समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है।
य इदं पठति स्तोत्रं नामाष्टशतमुत्तमम् ।
न तस्य दुरितं किञ्चिन्न रोगेभ्यो भयं भवेत् ॥ १६ ॥
अर्थ: जो भी मनुष्य भगवान भैरव के इस १०८ नामों वाले उत्तम स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, उसके जीवन में कोई भी पाप या संकट नहीं ठहरता और उसे कभी किसी भी प्रकार के असाध्य रोगों का भय नहीं सताता।
न च मारीभयं किञ्चिन्न च भूतभयं क्वचित् ।
न शत्रुभ्यो भयं किञ्चित् प्राप्नुयान्मानवः क्वचित् ॥ १७ ॥
अर्थ: इस स्तोत्र के प्रभाव से साधक को महामारी, संक्रामक व्याधियों, भूत-प्रेत, पिशाच, डाकनी-शाकिनी अथवा दृश्य-अदृश्य शत्रुओं का किंचित् मात्र भी भय नहीं रहता; वह सर्वत्र निर्भय होकर विचरण करता है।
मारीभये राजभये तथा चौराग्निजे भये ।
औत्पत्तिके महाघोरे तथा दुःखप्रदर्शने ॥ १८ ॥
अर्थ: जब समाज में महामारी का प्रकोप हो, शासन या न्यायालय का भय हो, चोरी, डकैती अथवा अग्नि का संकट हो, या कोई महाघोर प्राकृतिक व आकस्मिक विपत्ति आ पड़ी हो—
बन्धने च तथा घोरे पठेत्स्तोत्रमनुत्तमम् ।
सर्वं प्रशममायाति भयं भैरवकीर्तनात् ॥ १९ ॥
अर्थ: अथवा कारागार (जेल) व घोर बंधनों में फंसे होने की दशा में जब मनुष्य इस अनुपम स्तोत्र का पाठ करता है, तब भगवान भैरव के पावन नाम-कीर्तन मात्र से सभी प्रकार के भय और संकट तत्काल शांत हो जाते हैं।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ।
त्रिसन्ध्यं यः पठेद्देवि स सिद्धिं लभते पराम् ॥ २० ॥
अर्थ: साधक अपने मन में जिस-जिस शुभ कामना या मनोरथ का चिंतन करके इसका पाठ करता है, वह उसे निश्चित रूप से प्राप्त कर लेता है। हे देवि! जो मनुष्य तीनों संध्याओं (प्रातः, मध्याह्न, सायं) में इसका निष्ठापूर्वक पाठ करता है, वह परम आध्यात्मिक सिद्धि को प्राप्त करता है।
श्री काल भैरव स्तोत्र का महत्व एवं परिचय
सनातन धर्म की तंत्र और भक्ति परंपरा में भगवान काल भैरव (Lord Kaal Bhairav) देवाधिदेव महादेव के वह उग्र एवं करुणामयी अवतार हैं जो अपने शरणागत भक्तों के समस्त भयों, संकटों और काल के चक्र का समूल विनाश कर देते हैं। ‘भैरव’ शब्द की व्युत्पत्ति ही तीन दिव्य शक्तियों से मिलकर हुई है — ‘भ’ अर्थात् सृष्टि का भरण-पोषण, ‘र’ अर्थात् अज्ञान व संतापों का रमण/हरण, और ‘व’ अर्थात् समस्त विघ्नों का वमन या निवारण। जब जीवन में कठिन ग्रह-दोष (विशेषकर राहु-केतु और शनि की पीड़ा), शत्रु बाधा, गंभीर कानूनी विवाद अथवा अकारण भय मन को घेर लेता है, तब श्री काल भैरव स्तोत्र (Kal Bhairav Stotra) साधक के लिए अभेद्य दिव्य कवच बन जाता है।
रुद्रयामल तंत्र (विश्वसारोद्धार) में वर्णित यह स्तोत्र भगवान बटुक भैरव के १०८ पावन नामों का दिव्य सार है। इसे तंत्र शास्त्र में ‘आपदुद्धारक स्तोत्र’ की संज्ञा दी गई है, जिसका सीधा अर्थ है — जीवन की घोर से घोर आपदाओं और विपत्तियों के अथाह सागर से उबारने वाला महामंत्र। इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि यह केवल उग्र शक्तियों का संहारक ही नहीं है, बल्कि साधक के भीतर आत्मबल, निर्भयता, आध्यात्मिक तेज और विवेक की ज्योति प्रज्वलित करता है।
भगवान भैरव काशी के कोतवाल और धर्म के शाश्वत रक्षक हैं। जब एक निष्कपट भक्त दीन-भाव से उनके चरणों में नतमस्तक होकर इस स्तोत्र का पाठ करता है, तो काल भैरव उस बालक के समक्ष साक्षात रक्षक बनकर खड़े हो जाते हैं। उनकी कृपा से न केवल बाहरी बाधाएं व तांत्रिक दोष नष्ट होते हैं, बल्कि मन का अवसाद, नकारात्मक विचार और मृत्यु का भय भी विलीन हो जाता है।
श्री काल भैरव स्तोत्र पाठ करने की सही विधि एवं नियम
भगवान भैरव भाव के भूखे हैं। यद्यपि तंत्र साधना में भैरव पूजा के अत्यंत कठोर नियम होते हैं, परंतु गृहस्थ साधक जब बटुक भैरव रूप का ध्यान करके शुद्ध अंतःकरण से स्तोत्र पाठ करते हैं, तो वे अत्यंत सहजता से प्रसन्न होकर वात्सल्यमयी कृपा बरसाते हैं। स्तोत्र का पूर्ण शुभ फल प्राप्त करने हेतु निम्नलिखित शास्त्रसम्मत विधि का पालन करें:
- उत्तम दिन एवं समय: इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल अथवा सायंकाल प्रदोष काल में किया जा सकता है। विशेष रूप से रविवार, मंगलवार तथा प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि (कालाष्टमी / कालभैरव अष्टमी) को इसका पाठ सहस्र गुना फलदायी होता है।
- दिशा एवं आसन: स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा, ऊन अथवा लाल रंग के स्वच्छ आसन पर बैठें।
- दीप प्रज्वलन: भगवान शिव अथवा भगवान भैरव की प्रतिमा/चित्र के समक्ष सरसों के तेल का अथवा तिल के तेल का चौमुखी या एकमुखी दीपक प्रज्वलित करें। भैरव साधना में सरसों के तेल का दीपक विशेष रूप से नकारात्मक ऊर्जा को भस्म करने वाला माना जाता है।
- पूजन सामग्री एवं अर्पण: भगवान को लाल चंदन या सिंदूर का तिलक लगाएं, लाल पुष्प या गेंदे की माला अर्पित करें तथा सुगंधित धूपबत्ती जलाएं। भोग के रूप में गुड़, चना, भुने हुए उड़द, इमरती, ऋतुफल अथवा पंचमेवा अर्पित करें।
- पाठ एवं प्रार्थना: सर्वप्रथम ‘ॐ तीक्ष्णदंष्ट्र महाकाय कल्पान्तदहनोपम। भैरवाय नमस्तुभ्यमनुज्ञां दातुमर्हसि॥’ अथवा ध्यान श्लोक का स्मरण करके आज्ञा लें। तत्पश्चात शांत मन और स्पष्ट उच्चारण के साथ स्तोत्र के सभी श्लोकों का पाठ करें। पाठ के अंत में अपनी समस्त चिंताओं, भयों और संकटों के निवारण हेतु प्रार्थना करें।
श्री काल भैरव स्तोत्र पाठ के अद्भुत लाभ एवं महत्व
श्री काल भैरव स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ साधक के जीवन में चमत्कारी सुरक्षा और आध्यात्मिक रूपांतरण लाता है। स्तोत्र की प्रत्येक पंक्ति में शास्त्रों द्वारा प्रमाणित फल निहित हैं:
- अकारण भय, नकारात्मकता एवं तंत्र-दोष का नाश: स्तोत्र की फलश्रुति में कहा गया है — ‘न च मारीभयं किञ्चिन्न च भूतभयं क्वचित्, न शत्रुभ्यो भयं किञ्चित् प्राप्नुयान्मानवः क्वचित्’. इस स्तोत्र के नियमित पाठ से बुरी नजर, तंत्र-मंत्र का कुप्रभाव, प्रेत-बाधा तथा मन में छाया हुआ गहरा भय सदा के लिए नष्ट हो जाता है।
- घोर विपत्तियों, बंधनों एवं कानूनी संकटों से मुक्ति: श्लोक १९ में भगवान की महिमा गाई गई है — ‘बन्धने च तथा घोरे पठेत्स्तोत्रमनुत्तमम्, सर्वं प्रशममायाति भयं भैरवकीर्तनात्’. जब मनुष्य किसी गंभीर कानूनी विवाद, झूठे आरोपों, सरकारी भय या कारागार जैसे घोर संकट में फंस जाता है, तब भैरव स्तोत्र ढाल बनकर उसे मुक्ति दिलाता है।
- दरिद्रता का समूल नाश और धन-ऐश्वर्य की प्राप्ति: स्तोत्र में भगवान भैरव का एक पावन नाम है — ‘धनदोऽधनहारी च धनवान् प्रीतिवर्धनः’. वे दरिद्रता और दुर्भाग्य को हरकर साधक के घर में सुख, समृद्धि, व्यापारिक उन्नति और धन के नए मार्ग प्रशस्त करते हैं।
- असाध्य रोगों और अकाल मृत्यु से सुरक्षा: स्तोत्र उद्घोष करता है — ‘न तस्य दुरितं किञ्चिन्न रोगेभ्यो भयं भवेत्… सर्वसिद्धिप्रदो वैद्यः प्रभविष्णुरितीव हि’. भैरव जी भव-रोगों और शारीरिक व्याधियों के परम वैद्य हैं। उनके नाम-कीर्तन से असाध्य रोगों की पीड़ा शांत होती है और अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है।
- शनि एवं राहु-केतु के क्रूर दोषों का शमन: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भगवान काल भैरव की आराधना से राहु और केतु की पीड़ा तत्काल शांत होती है तथा शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या का अशुभ प्रभाव निष्प्रभावी हो जाता है।
भगवान काल भैरव के अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)
भगवान काल भैरव एवं देवाधिदेव महादेव की संपूर्ण कृपा प्राप्त करने हेतु चालीसा सागर पर उपलब्ध इन पावन पाठों का भी नित्य पाठ करें:
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्र.काल भैरव स्तोत्र (आपदुद्धारक बटुक भैरव स्तोत्र) का मुख्य उद्देश्य और महत्व क्या है?
श्री काल भैरव स्तोत्र देवाधिदेव महादेव के उग्र-रक्षक स्वरूप भगवान भैरव की आराधना का अत्यंत प्रभावशाली पाठ है। इसका मूल उद्देश्य साधक को अकाल मृत्यु के भय, भूत-प्रेत बाधा, तंत्र-दोष, शत्रु-षड्यंत्र, कानूनी संकट और असाध्य रोगों से मुक्ति दिलाना है। रुद्रयामल तंत्र के अनुसार, इसके नियमित पाठ से साधक को सर्वत्र अभय और विजय प्राप्त होती है।
प्र.क्या गृहस्थ साधक काल भैरव स्तोत्र का पाठ अपने घर में कर सकते हैं?
हाँ, गृहस्थ साधक भगवान भैरव के सौम्य एवं कृपालु 'बटुक भैरव' रूप का ध्यान करके इस स्तोत्र का पाठ घर में भी पूर्ण श्रद्धा के साथ कर सकते हैं। स्तोत्र के ध्यान में भगवान को 'वन्दे बालं स्फटिकसदृशं... विशदवदनं सुप्रसन्नं त्रिनेत्रं' अर्थात् स्फटिक के समान निर्मल, बालक रूप और प्रसन्न मुख वाला बताया गया है। शुद्ध अंतःकरण, सात्त्विक आचरण और रक्षा की भावना से किया गया पाठ अत्यंत कल्याणकारी होता है।
प्र.काल भैरव स्तोत्र का पाठ किस दिन और किस समय करना सर्वाधिक फलदायी माना जाता है?
काल भैरव स्तोत्र का पाठ रविवार, मंगलवार तथा प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि (कालाष्टमी या कालभैरव अष्टमी) को करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है। समय के दृष्टिकोण से इसे प्रातःकाल सूर्योदय के समय अथवा सायंकाल प्रदोष काल व रात्रि के समय सरसों के तेल का दीपक जलाकर करना विशेष रूप से सिद्धिकारक होता है।
प्र.स्तोत्र में भगवान भैरव को 'आपदुद्धारक' क्यों कहा गया है?
स्तोत्र की फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है — 'मारीभये राजभये तथा चौराग्निजे भये... सर्वं प्रशममायाति भयं भैरवकीर्तनात्'। 'आपदुद्धारक' का अर्थ है समस्त घोर आपदाओं, संकटों, कर्ज और विपत्तियों के अथाह सागर से उबारने वाला। जब साधक चारों ओर से संकटों से घिर जाता है, तब भगवान भैरव का नाम-कीर्तन तत्काल ढाल बनकर उसकी रक्षा करता है।
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