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कृष्ण

श्री कृष्ण चालीसा— अर्थ, लाभ एवं पाठ विधि सहित

Krishna Chalisa (Hindi Lyrics, Meaning & PDF)

मनमोहन मुरलीधर भगवान श्रीकृष्ण के पावन स्वरूप का स्मरण — नित्य पाठ से मन की चिंताएं दूर होती हैं और प्रेम, आनंद व भक्ति की प्राप्ति होती है।

सुन्दरदास६ मिनट पाठ

श्री कृष्ण चालीसा संपूर्ण पाठ

दोहा एवं ४० चौपाइयाँ सरल हिंदी भावार्थ सहित

प्रारंभिक दोहा

बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।

अरुण अधर जनु बिम्बफल, नयन कमल अभिराम॥

अर्थ: जिनके कर-कमलों में मधुर मुरली सुशोभित है, जिनका श्याम वर्ण सजल मेघ के समान कांतिमान है; जिनके लाल अधर पके हुए बिम्बफल के समान और नयन खिले हुए कमल के समान अत्यंत मनोहारी हैं;

पूर्ण इन्द्र अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज।

जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥

अर्थ: जिनका मुखमंडल पूर्णिमा के चंद्रमा और प्रफुल्लित कमल के समान तेजस्वी है, जो सुंदर पीतांबर धारण किए हैं; कामदेव के सौंदर्य को भी लजाने वाले उन मनमोहन श्री कृष्णचंद्र महाराज की जय हो!

चौपाई

जय यदुनंदन जय जगवंदन।

जय वसुदेव देवकी नन्दन॥

अर्थ: यदुवंश के भूषण और संपूर्ण जगत द्वारा वंदनीय भगवान श्रीकृष्ण की जय हो! वसुदेव जी और माता देवकी के आनंदकंद नंदन की जय हो!

जय यशुदा सुत नन्द दुलारे।

जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥

अर्थ: माता यशोदा के सुपुत्र और नंदबाबा के परम दुलारे कन्हैया की जय हो! आप अपने शरणागत भक्तों के नयनों के प्रिय तारे हैं।

जय नटनागर, नाग नथइया।

कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया॥

अर्थ: हे नटवर नागर, कालिया नाग का मान मर्दन करने वाले, गऊओं को चराने वाले बालकृष्ण कन्हैया! आपकी सर्वदा जय हो।

पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो।

आओ दीनन कष्ट निवारो॥

अर्थ: आपने अपनी कनिष्ठिका अंगुली के नख पर विशाल गोवर्धन पर्वत को धारण किया था; हे प्रभु! पधारिए और मुझ दीन के समस्त कष्टों का निवारण कीजिए।

वंशी मधुर अधर धरि टेरौ।

होवे पूर्ण विनय यह मेरौ॥

अर्थ: अपने अमृतमयी अधरों पर मधुर बांसुरी रखकर अपनी पावन तान सुनाइए, जिससे मेरी यह विनीत और आत्मीय प्रार्थना पूर्ण हो सके।

आओ हरि पुनि माखन चाखो।

आज लाज भारत की राखो॥

अर्थ: हे श्रीहरि! पुनः पधारिए और भाव का माखन आरोगिए; और अपने शरणागत भक्तों तथा इस पावन धरा की मर्यादा की रक्षा कीजिए।

गोल कपोल, चिबुक अरुणारे।

मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥

अर्थ: आपके गोल-मटोल कपोल (गाल) और लालिमायुक्त ठोड़ी अत्यंत सुंदर हैं; आपकी यह मंद-मधुर मुस्कान संपूर्ण संसार पर मोहिनी डाल देती है।

राजित राजिव नयन विशाला।

मोर मुकुट वैजन्तीमाला॥

अर्थ: आपके कमल के समान विशाल नयन शोभा पा रहे हैं; मस्तक पर मोरमुकुट और वक्षस्थल पर दिव्य वैजयंती माला सुशोभित है।

कुंडल श्रवण, पीत पट आछे।

कटि किंकिणी काछनी काछे॥

अर्थ: कानों में मकराकृत कुंडल और शरीर पर सुंदर पीतांबर शोभायमान है; कमर में करधनी (किंकिणी) और सुंदर पीली काछनी बंधी हुई है।

नील जलज सुन्दर तनु सोहे।

छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥

अर्थ: नीले कमल के समान आपका सुंदर श्याम सलोना रूप सुशोभित है, जिसकी अलौकिक छवि देखकर देवता, मनुष्य और मुनियों का मन मुग्ध हो जाता है।

मस्तक तिलक, अलक घुँघराले।

आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥

अर्थ: मस्तक पर चंदन का तिलक और घुंघराली अलकें (केश) शोभा पा रही हैं; हे मधुर बांसुरी बजाने वाले बालकृष्ण! मेरे हृदय में पधारिए।

करि पय पान, पूतनहि तार्यो।

अका बका कागासुर मार्यो॥

अर्थ: आपने बालपन में स्तनपान करते हुए विष पिलाने आई पूतना का उद्धार किया, तथा अकासुर, बकासुर और कागासुर जैसे मायावी राक्षसों का संहार किया।

मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला।

भै शीतल लखतहिं नंदलाला॥

अर्थ: जब दावानल (अग्नि) की लपटों से संपूर्ण मधुवन जलने लगा, तब हे नंदलाल! आपके दर्शन मात्र से वह भीषण अग्नि शीतल हो गई।

सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई।

मूसर धार वारि वर्षाई॥

अर्थ: जब देवराज इंद्र ने कुपित होकर संपूर्ण ब्रजभूमि पर मूसलाधार जल की प्रलयंकारी वर्षा कर दी;

लगत लगत व्रज चहन बहायो।

गोवर्धन नख धारि बचायो॥

अर्थ: और संपूर्ण ब्रज जलमग्न होने लगा, तब आपने अपनी कनिष्ठिका अंगुली के नख पर गोवर्धन पर्वत उठाकर पूरे ब्रजमंडल की रक्षा की।

लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई।

मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥

अर्थ: मिट्टी खाने के प्रसंग में जब माता यशोदा के मन में संशय हुआ, तब आपने अपने छोटे से मुख में संपूर्ण चौदह भुवनों का विराट रूप दिखा दिया।

दुष्ट कंस अति उधम मचायो।

कोटि कमल जब फूल मंगायो॥

अर्थ: जब दुष्ट कंस ने भारी उत्पात मचाकर यमुना के विषैले दह से एक करोड़ नीलकमल लाने का असंभव आदेश दिया;

नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें।

चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥

अर्थ: तब आपने विषैले कालिया नाग के फनों को नाथ लिया और अपने पावन चरण-चिह्न देकर यमुना को विषमुक्त व ब्रज को निर्भय कर दिया।

करि गोपिन संग रास विलासा।

सबकी पूरण करी अभिलाषा॥

अर्थ: आपने शरद पूर्णिमा की रात्रि में गोपियों के साथ महारास की दिव्य लीला रचकर सबकी निष्काम प्रेमा-भक्ति की अभिलाषा पूर्ण की।

केतिक महा असुर संहार्यो।

कंसहि केस पकड़ि दै मार्यो॥

अर्थ: आपने अनेक महाभयंकर असुरों का संहार किया और अंत में अत्याचारी कंस के केश पकड़कर उसे भूमि पर पटक कर उसका अंत किया।

मातपिता की बन्दि छुड़ाई।

उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥

अर्थ: आपने कारागार से अपने माता-पिता (देवकी-वसुदेव) के बंधन कटवाए और अपने नाना राजा उग्रसेन को पुनः मथुरा का राजपद सौंपा।

महि से मृतक छहों सुत लायो।

मातु देवकी शोक मिटायो॥

अर्थ: आपने पाताल लोक से माता देवकी के पूर्व जन्म के छह मृत पुत्रों को लाकर अपनी माता के चिर संचित शोक को सदा के लिए मिटा दिया।

भौमासुर मुर दैत्य संहारी।

लाये षट दश सहसकुमारी॥

अर्थ: आपने भौमासुर (नरकासुर) और मुर दैत्य का वध किया और उनके बंदीगृह से सोलह हजार एक सौ कन्याओं को मुक्त कराकर उन्हें सम्मान दिया।

दै भीमहिं तृण चीर सहारा।

जरासिंधु राक्षस कहँ मारा॥

अर्थ: मल्लयुद्ध में महाबली भीम को तिनके को चीरने का संकेत देकर आपने अजेय असुर जरासंध का वध करवाया।

असुर बकासुर आदिक मार्यो।

भक्तन के तब कष्ट निवार्यो॥

अर्थ: आपने बकासुर आदि अनेक आसुरी शक्तियों का नाश कर समय-समय पर अपने धर्मपरायण भक्तों के समस्त कष्टों का निवारण किया।

दीन सुदामा के दुःख टार्यो।

तंदुल तीन मूंठ मुख डार्यो॥

अर्थ: आपने अपने बालसखा दीन सुदामा के दारिद्र्य को दूर करने हेतु उनके लाए हुए तीन मुट्ठी कच्चे तंदुल (चावल) बड़े प्रेम से आरोग लिए।

प्रेम के साग विदुर घर माँगे।

दुर्योधन के मेवा त्यागे॥

अर्थ: दुर्योधन के छप्पन प्रकार के स्वादिष्ट मेवे और राजसी पकवान त्यागकर आपने भक्त विदुर के घर प्रेमपूर्वक बथुए का सादा साग ग्रहण किया।

लखी प्रेम की महिमा भारी।

ऐसे श्याम दीन हितकारी॥

अर्थ: आपने संसार को प्रत्यक्ष दिखाया कि प्रभु के दरबार में केवल निर्मल प्रेम की ही महत्ता है; ऐसे कृपालु श्याम दीनों के सच्चे हितैषी हैं।

भारत के पारथ रथ हाँके।

लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥

अर्थ: महाभारत के धर्मयुद्ध में आपने अर्जुन (पार्थ) के रथ के सारथी बनकर अश्वों की लगाम थामी और धर्म की रक्षा हेतु सुदर्शन चक्र उठाया।

निज गीता के ज्ञान सुनाए।

भक्तन हृदय सुधा वर्षाए॥

अर्थ: आपने रणभूमि में श्रीमद्भगवद्गीता का अमर ज्ञान सुनाया, जिससे युगों-युगों तक मानव जाति के हृदय में ज्ञान-अमृत की वर्षा होती रहेगी।

मीरा थी ऐसी मतवाली।

विष पी गई बजाकर ताली॥

अर्थ: भक्त शिरोमणि मीराबाई आपके प्रेम में ऐसी मतवाली थीं कि वे राणा द्वारा भेजा गया विष का प्याला भी हंसते हुए ताली बजाकर पी गईं।

राना भेजा साँप पिटारी।

शालीग्राम बने बनवारी॥

अर्थ: जब राणा ने मीरा को मृत्यु देने हेतु पिटारी में विषधर काला सर्प भेजा, तो आपके चमत्कार से वह साक्षात् शालीग्राम शिला बन गया।

निज माया तुम विधिहिं दिखायो।

उर ते संशय सकल मिटायो॥

अर्थ: जब ब्रह्मा जी को आपके पूर्ण ब्रह्म स्वरूप पर संशय हुआ, तब आपने अपनी अलौकिक माया का दर्शन कराकर उनके मन का सारा भ्रम मिटा दिया।

तब शत निन्दा करि तत्काला।

जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥

अर्थ: भरी सभा में सौ अपशब्द सहन करने के उपरांत आपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का उद्धार कर उसे अपने तेज में लीन कर लिया।

जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।

दीनानाथ लाज अब जाई॥

अर्थ: जब भरी राजसभा में महारानी द्रौपदी ने विवश होकर पुकारा कि 'हे दीनानाथ! अब मेरी लाज आपके हाथ में है;'

तुरतहि वसन बने नंदलाला।

बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥

अर्थ: तब नंदलाल तुरंत स्वयं अनंत वस्त्र बन गए; द्रौपदी का चीर बढ़ता गया और दुष्ट दुःशासन व कौरवों का मुख लज्जा से काला हो गया।

अस अनाथ के नाथ कन्हइया।

डूबत भंवर बचावइ नइया॥

अर्थ: हे अनाथों के एकमात्र नाथ कन्हैया! आप ऐसे दयालु हैं जो संसार रूपी भवसागर के भंवर में डूबती हुई जीवन-नैया को पार लगा देते हैं।

सुन्दरदास आ उर धारी।

दया दृष्टि कीजै बनवारी॥

अर्थ: भक्त सुन्दरदास आपके इस मनोहारी स्वरूप को हृदय में धारण कर प्रार्थना करते हैं कि हे बनवारी! मुझ पर अपनी वात्सल्यमयी कृपा दृष्टि कीजिए।

नाथ सकल मम कुमति निवारो।

क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥

अर्थ: हे नाथ! मेरे अंतःकरण की समस्त दुर्बुद्धि व अज्ञान का निवारण कीजिए और मेरे ज्ञात-अज्ञात अपराधों को शीघ्र क्षमा कर दीजिए।

खोलो पट अब दर्शन दीजै।

बोलो कृष्ण कन्हइया की जै॥

अर्थ: अब अपने मंदिर के पावन कपाट खोलकर मुझे दिव्य दर्शन दीजिए; प्रेम से बोलिए—श्री कृष्ण कन्हैया लाल की जय!

समापन दोहा

यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।

अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥

अर्थ: जो भी भक्त अपने हृदय में सच्ची निष्ठा और प्रेम धारण कर इस कृष्ण चालीसा का पाठ करता है, उसे अष्ट सिद्धियाँ, नवों निधियाँ और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारों पुरुषार्थ सुलभ हो जाते हैं।

श्री कृष्ण चालीसा का महत्व एवं परिचय

भगवान श्रीकृष्ण सनातन चेतना के वह पूर्ण अवतार हैं, जिनमें जीवन के प्रत्येक रंग का अनुपम संगम दिखाई देता है। वे एक ओर वृंदावन की कुंज-गलियों में गऊएं चराने वाले और माखन चुराने वाले नटखट बालकृष्ण हैं, तो दूसरी ओर कुरुक्षेत्र के भीषण रणक्षेत्र में मोहग्रस्त अर्जुन को निष्काम कर्मयोग का अमर संदेश देने वाले साक्षात् योगेश्वर हैं।

कवि सुन्दरदास द्वारा रचित ‘कृष्ण चालीसा’ प्रभु के बाल-स्वरूप, उनकी मधुर बंशी की धुन, तथा भक्तों के प्रति उनकी अगाध शरणागत-वत्सलता का एक पावन स्तोत्र है। कालिया नाग के फनों पर नृत्य करने वाले, गोवर्धन को अपनी कनिष्ठिका अंगुली पर उठाने वाले, तथा पूतना और कंस जैसे दुष्टों का संहार करने वाले भगवान श्रीकृष्ण का यह स्तुति-पाठ भक्त के हृदय में असीम प्रेम और आनंद का संचार करता है।

इस चालीसा का पाठ हमें स्मरण कराता है कि चाहे द्रौपदी की लाज की रक्षा करनी हो, या सुदामा के तीन मुट्ठी तंदुल से प्रसन्न होकर तीनों लोकों का ऐश्वर्य लुटाना हो—प्रभु सदा केवल निश्छल भाव और प्रेम के भूखे हैं।

श्री कृष्ण चालीसा पाठ करने की सही विधि एवं नियम

भगवान श्रीकृष्ण की उपासना अत्यंत सरल, प्रेममयी और सहज है:

  1. पवित्रता एवं वस्त्र: बुधवार, एकादशी अथवा जन्माष्टमी के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ पीले अथवा श्वेत वस्त्र धारण करें।
  2. स्थान एवं दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। पूजा की वेदी पर पीला वस्त्र बिछाकर लड्डू गोपाल अथवा राधा-कृष्ण की मनोहारी छवि स्थापित करें।
  3. तुलसीदल एवं चंदन: भगवान श्रीकृष्ण को गोपीचंदन का तिलक लगाएं, मोरपंख अर्पित करें, पीले पुष्प और अनिवार्य रूप से तुलसी दल समर्पित करें।
  4. दीप प्रज्वलन: शुद्ध गाय के घी का दीपक और सुगंधित चंदन की धूपबत्ती जलाएं।
  5. भोग एवं पाठ: ताजे मक्खन में मिश्री मिलाकर भोग लगाएं। एकाग्र मन से दोनों प्रारंभिक दोहे, चालीस चौपाइयाँ और समापन दोहे का पाठ करें। पाठ के पश्चात ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करते हुए आरती करें।

श्री कृष्ण चालीसा पाठ के अद्भुत लाभ एवं महत्व

कृष्ण चालीसा का नियमित और भावपूर्ण पाठ करने से साधक को निम्नलिखित अमूल्य फल प्राप्त होते हैं:

  • मानसिक संताप और अवसाद से मुक्ति: भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण मन की बेचैनी को दूर कर अवर्णनीय आंतरिक आनंद और शीतलता प्रदान करता है।
  • विपत्तियों में दैवीय रक्षा: “डूबत भंवर बचावइ नइया” — जैसे प्रभु ने द्रौपदी और ब्रजवासियों की रक्षा की, वैसे ही जीवन के संकटों में साधक को अज्ञात संबल प्राप्त होता है।
  • आध्यात्मिक ज्ञान और कर्म का विवेक: गीता के उपदेशक का ध्यान करने से जीवन के कठिन निर्णयों में सही दिशा और अनासक्त कर्म करने की प्रेरणा मिलती है।
  • पारिवारिक सामंजस्य और प्रेम: घर में कलह दूर होकर सदस्यों के बीच निश्छल प्रेम और सद्भावना का विकास होता है।
  • चारों पुरुषार्थों की सिद्धि: “अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि” — साधक को जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सहज प्राप्ति होती है।

भगवान श्रीकृष्ण के अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)

योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की असीम कृपा और भक्ति प्राप्ति हेतु इन पवित्र पाठों का भी नित्य पाठ करें:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र.कृष्ण चालीसा का पाठ कब और किस दिन करना सबसे उत्तम माना जाता है?

बुधवार, एकादशी तिथि और विशेष रूप से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर कृष्ण चालीसा का पाठ करना अत्यंत फलदायी है। नित्य प्रातःकाल अथवा संध्या समय गोधूलि वेला में पाठ करने से मन में असीम शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

प्र.श्रीकृष्ण पूजन में कौन सी वस्तुएं अनिवार्य रूप से अर्पित करनी चाहिए?

भगवान श्रीकृष्ण को तुलसी दल (तुलसी का पत्ता), गाय का शुद्ध माखन, मिश्री, पीले पुष्प (विशेषकर वैजयंती या गेंदा), और पीले वस्त्र अति प्रिय हैं। तुलसी दल के बिना कान्हा का भोग अधूरा माना जाता है।

प्र.क्या मानसिक तनाव और निराशा से मुक्ति के लिए कृष्ण चालीसा का पाठ उपयोगी है?

हाँ, भगवान श्रीकृष्ण आनंदकंद और गीता के उपदेशक हैं। चालीसा की चौपाइयों का भावपूर्ण पाठ मन से अवसाद, भय और निराशा को समाप्त कर जीवन में आशा, उत्साह और कर्म करने की नई प्रेरणा भर देता है।

प्र.संतान सुख और पारिवारिक प्रेम के लिए कृष्ण चालीसा का पाठ कैसे करें?

दंपति प्रातः स्नान के पश्चात लड्डू गोपाल की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराकर, माखन-मिश्री का भोग लगाते हुए 41 दिनों तक नियमित कृष्ण चालीसा का पाठ करें। इससे घर में वात्सल्य और सुख-शांति का वातावरण बनता है।

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