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हनुमान

श्री हनुमान चालीसा— अर्थ, लाभ एवं पाठ विधि सहित

Hanuman Chalisa (Hindi Lyrics, Meaning & PDF)

संकटमोचन श्री हनुमान जी के असीम बल, बुद्धि और निष्काम भक्ति की वंदना — नित्य पाठ से भय, बाधाओं और कष्टों का निवारण होता है।

गोस्वामी तुलसीदास७ मिनट पाठ

श्री हनुमान चालीसा संपूर्ण पाठ

दोहा एवं ४० चौपाइयाँ सरल हिंदी भावार्थ सहित

प्रारंभिक दोहा

श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।

बरनउं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

अर्थ: श्री गुरुदेव के चरण-कमलों की पावन धूलि से अपने मन रूपी दर्पण को स्वच्छ करके, मैं श्री रघुवीर के उस निर्मल यश का गान करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों फल प्रदान करने वाला है।

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।

बल बुधि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार॥

अर्थ: हे पवनकुमार! स्वयं को ज्ञान और बल से हीन जानकर मैं आपका स्मरण करता हूँ। मुझे शारीरिक बल, सद्बुद्धि और विद्या प्रदान करें तथा मेरे समस्त क्लेशों व मानसिक विकारों को दूर कर दें।

चौपाई

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर।

जै कपीस तिहुँ लोक उजागर॥

अर्थ: हे ज्ञान और सद्गुणों के अथाह सागर श्री हनुमान जी, आपकी जय हो! तीनों लोकों में अपनी पावन कीर्ति से आलोक फैलाने वाले कपीश्वर की जय हो!

रामदूत अतुलित बलधामा।

अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥

अर्थ: आप भगवान श्रीराम के अनन्य दूत और अतुलनीय बल के परम धाम हैं। आप माता अंजनी के पराक्रमी पुत्र और पवनसुत के नाम से विख्यात हैं।

महाबीर बिक्रम बजरंगी।

कुमति निवार सुमति के संगी॥

अर्थ: हे असीम पराक्रमी और वज्र के समान सुदृढ़ अंगों वाले महावीर! आप कुबुद्धि व नकारात्मक विचारों का निवारण कर सद्बुद्धि और सत्कर्म की प्रेरणा देने वाले हैं।

कंचन बरण बिराज सुबेशा।

कानन कुंडल कुंचित केशा॥

अर्थ: आपका स्वरूप सुवर्ण के समान कांतिमान और वेश अत्यंत मनोहारी है। आपके कानों में दिव्य कुंडल और घुंघराले केश अद्भुत शोभा पा रहे हैं।

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।

काँधे मूँज जनेऊ साजै॥

अर्थ: आपके हाथों में वज्र के समान गदा और धर्म की ध्वजा सुशोभित है, तथा आपके कंधे पर पवित्र मूँज का यज्ञोपवीत (जनेऊ) विराजित है।

शंकर सुवन केशरीनन्दन।

तेज प्रताप महा जग वंदन॥

अर्थ: आप भगवान शिव के रुद्रावतार और वानरराज केसरी के नंदन हैं। आपका अलौकिक तेज और पराक्रम इतना महान है कि सारा संसार आपकी वंदना करता है।

विद्यावान गुणी अति चातुर।

राम काज करिबे को आतुर॥

अर्थ: आप समस्त विद्याओं के ज्ञाता, परम गुणवान और अत्यंत चतुर हैं। प्रभु श्रीराम के प्रत्येक कार्य को सिद्ध करने के लिए आप सदा तत्पर रहते हैं।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।

राम लखन सीता मन बसिया॥

अर्थ: प्रभु श्रीराम के दिव्य चरित्र और गाथाओं को सुनने में आपको परम आनंद आता है। आपके हृदय में सदा श्री राम, लक्ष्मण जी और माता सीता वास करते हैं।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।

विकट रूप धरि लंक जरावा॥

अर्थ: आपने अति सूक्ष्म रूप धरकर अशोक वाटिका में माता सीता को दर्शन दिए, और अत्यंत विकराल रूप धारण करके लंका नगरी को भस्म किया।

भीम रूप धरि असुर सँहारे।

रामचन्द्र के काज सँवारे॥

अर्थ: आपने विशाल व संहारक रूप धारण कर दुष्ट असुरों का संहार किया और प्रभु रामचंद्र जी के सभी संकल्पों को सिद्ध किया।

लाय सजीवन लखन जियाये।

श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥

अर्थ: आपने द्रोणाचल से संजीवनी बूटी लाकर मूर्छित लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा की, जिससे हर्षित होकर प्रभु श्रीराम ने आपको प्रेमपूर्वक हृदय से लगा लिया।

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।

तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

अर्थ: श्री रघुपति ने आपकी अपार प्रशंसा करते हुए कहा कि हे हनुमान! तुम मुझे मेरे प्रिय भाई भरत के समान ही अत्यंत प्रिय हो।

सहस बदन तुम्हरो यश गावैं।

अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं॥

अर्थ: सहस्र मुख वाले शेषनाग भी तुम्हारे यश का पार नहीं पा सकते—यह कहकर वैकुंठपति श्रीराम ने आपको पुनः अपने कंठ से लगा लिया।

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा।

नारद शारद सहित अहीशा॥

अर्थ: सनक, सनंदन आदि परमर्षि, ब्रह्मादि देवगण, मुनीश्वर, देवर्षि नारद, माता सरस्वती और शेषनाग जी भी आपकी महिमा का निरंतर गान करते हैं।

यम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।

कवि कोविद कहि सकैं कहाँ ते॥

अर्थ: यमराज, कुबेर और समस्त दिशाओं के दिक्पाल जहाँ आपकी स्तुति में असमर्थ हैं, वहाँ साधारण कवि और विद्वान आपकी कीर्ति का पूर्ण वर्णन कैसे कर सकते हैं?

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।

राम मिलाय राजपद दीन्हा॥

अर्थ: आपने सुग्रीव जी पर परम उपकार किया—उन्हें प्रभु श्रीराम से मिलवाया और बाली के भय से मुक्त कराकर उन्हें किष्किंधा का राजपद दिलाया।

तुम्हरो मंत्र विभीषण माना।

लंकेश्वर भए सब जग जाना॥

अर्थ: आपकी युक्ति और परामर्श को विभीषण जी ने स्वीकार किया, जिसके फलस्वरूप वे लंका के अधिपति बने—यह सारा संसार जानता है।

युग सहस्र योजन पर भानू।

लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥

अर्थ: जो सूर्य यहाँ से सहस्रों योजन की दूरी पर स्थित है, उसे आपने बाल्यावस्था में एक मधुर व मीठा फल समझकर सहज ही निगल लिया था।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।

जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥

अर्थ: आपने प्रभु श्रीराम की अंगूठी को अपने मुख में रखकर विशाल समुद्र को लाँघ लिया—आपके अतुलनीय पराक्रम के सम्मुख इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।

दुर्गम काज जगत के जेते।

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥

अर्थ: इस संसार में जितने भी कठिन से कठिन कार्य हैं, वे सभी आपकी कृपा दृष्टि और अनुग्रह से सहज और सुलभ हो जाते हैं।

राम दुआरे तुम रखवारे।

होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥

अर्थ: प्रभु श्रीराम के पावन द्वार के आप रक्षक हैं। आपकी अनुमति और कृपा के बिना कोई भी उस दिव्य दरबार में प्रवेश नहीं पा सकता।

सब सुख लहै तुम्हारी सरना।

तुम रक्षक काहू को डर ना॥

अर्थ: आपकी पावन शरण में आने वाले को संसार के समस्त सुख प्राप्त हो जाते हैं। जब आप स्वयं रक्षक हों, तो फिर किसी बात का भय नहीं रह जाता।

आपन तेज सम्हारो आपै।

तीनों लोक हाँक तें काँपै॥

अर्थ: अपने असीम तेज और वेग को केवल आप स्वयं ही संभाल सकते हैं। आपकी एक भीषण हुंकार मात्र से तीनों लोक भय से कांप उठते हैं।

भूत पिशाच निकट नहिं आवै।

महाबीर जब नाम सुनावै॥

अर्थ: जहाँ महावीर हनुमान जी का नाम उच्चारण किया जाता है, वहाँ भूत, पिशाच, प्रेत और कोई भी आसुरी शक्तियाँ पास भी नहीं फटक सकतीं।

नासै रोग हरै सब पीरा।

जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

अर्थ: वीर हनुमान जी के नाम का निरंतर जप और स्मरण करने से समस्त असाध्य रोग नष्ट हो जाते हैं और सभी शारीरिक-मानसिक पीड़ाएं मिट जाती हैं।

संकट तें हनुमान छुड़ावै।

मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥

अर्थ: जो भक्त मन, कर्म और वाणी से हनुमान जी का ध्यान धरता है, हनुमान जी उसे जीवन के प्रत्येक घोर संकट से सकुशल उबार लेते हैं।

सब पर राम तपस्वी राजा।

तिन के काज सकल तुम साजा॥

अर्थ: तपस्वी शिरोमणि मर्यादा पुरुषोत्तम राजा रामचंद्र जी सबसे श्रेष्ठ हैं, और आपने उनके समस्त कठिन व असंभव कार्यों को पूर्ण किया।

और मनोरथ जो कोई लावै।

सोइ अमित जीवन फल पावै॥

अर्थ: सच्चे भाव से जो कोई भी आपके सम्मुख अपनी मनोकामना लेकर आता है, उसे जीवन में ऐसा अक्षय फल प्राप्त होता है जिसकी कोई सीमा नहीं।

चारों जुग परताप तुम्हारा।

है परसिद्ध जगत उजियारा॥

अर्थ: सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग—चारों युगों में आपका प्रताप अखण्ड है और आपकी दिव्य कीर्ति संपूर्ण ब्रह्मांड को आलोकित कर रही है।

साधु संत के तुम रखवारे।

असुर निकंदन राम दुलारे॥

अर्थ: आप सज्जनों, साधु-संतों और धर्मपरायण लोगों के रक्षक हैं, दुष्ट असुरों का संहार करने वाले हैं और प्रभु श्रीराम के परम दुलारे हैं।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।

अस बर दीन जानकी माता॥

अर्थ: माता जानकी ने आपको यह मंगलमय वरदान दिया है कि आप अपने अनन्य भक्तों को आठों सिद्धियाँ और नवों निधियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं।

राम रसायन तुम्हरे पासा।

सदा रहो रघुपति के दासा॥

अर्थ: आपके पास राम-नाम रूपी भक्ति की अमृतमयी औषधि (रसायन) है। आप सदैव प्रभु श्रीरघुनाथ जी के परम निष्ठावान सेवक बने रहते हैं।

तुम्हरे भजन राम को पावै।

जनम जनम के दुख बिसरावै॥

अर्थ: आपका भजन और गुणगान करने से भक्त को प्रभु श्रीराम की प्राप्ति होती है, तथा जन्म-जन्मांतर के संचित शोक व संताप मिट जाते हैं।

अंतकाल रघुबर पुर जाई।

जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥

अर्थ: आपकी कृपा से भक्त अंत समय में श्री रघुवीर के पावन साकेत धाम को प्राप्त करता है, और यदि पुनर्जन्म भी हो तो वह प्रभु का भक्त कहलाता है।

और देवता चित्त न धरई।

हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥

अर्थ: किसी अन्य देवता की विशेष साधना किए बिना भी, केवल श्री हनुमान जी की निष्ठापूर्वक सेवा करने से भक्त जीवन के समस्त सुखों को प्राप्त कर लेता है।

संकट कटै मिटै सब पीरा।

जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

अर्थ: जो भी भक्त महाबली वीर हनुमान जी का स्मरण करता है, उसके जीवन के सारे संकट कट जाते हैं और समस्त व्याधियाँ व पीड़ाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

जै जै जै हनुमान गोसाईं।

कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥

अर्थ: हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझ दीन भक्त पर एक दयालु सद्गुरु की भांति अपनी कृपा बनाए रखें।

जो सत बार पाठ कर कोई।

छूटहि बंदि महा सुख होई॥

अर्थ: जो व्यक्ति सौ बार इस पावन चालीसा का पाठ करता है, वह संसार के समस्त बंधनों और संकटों से मुक्त होकर परम सुख का अनुभव करता है।

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।

होय सिद्धि साखी गौरीसा॥

अर्थ: जो भी इस हनुमान चालीसा का नियमपूर्वक पाठ करता है, उसे अवश्य ही सिद्धि प्राप्त होती है—इस सत्य के साक्षी स्वयं देवाधिदेव महादेव हैं।

तुलसीदास सदा हरि चेरा।

कीजै नाथ हृदय महं डेरा॥

अर्थ: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि वे सदा प्रभु श्रीहरि के अनन्य सेवक हैं; हे नाथ हनुमान जी! आप सदा के लिए मेरे हृदय मंदिर में वास कीजिए।

समापन दोहा

पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।

राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

अर्थ: हे पवनपुत्र, संकटों का नाश करने वाले और साक्षात् मंगल की मूर्ति! हे देवराज! आप प्रभु श्री राम, लक्ष्मण जी और माता सीता सहित सदा मेरे हृदय में निवास कीजिए।

श्री हनुमान चालीसा का महत्व एवं परिचय

जब मन में कोई भय हो, विपत्तियाँ चारों ओर से घेर रही हों या जीवन में आत्मबल की कमी महसूस हो, तब भक्त अनायास ही संकटमोचन श्री हनुमान जी की शरण में पहुँचता है। हनुमान जी केवल असीम बल और पराक्रम के स्वामी ही नहीं हैं, बल्कि वे निष्काम सेवा, अगाध निष्ठा और अगाध ज्ञान के भी साक्षात् प्रतीक हैं। उनकी कृपा दृष्टि मात्र से असंभव कार्य भी सहज हो जाते हैं।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने जब अवधी भाषा में इस चालीस चौपाइयों वाली स्तुति की रचना की, तो उन्होंने इसमें केवल हनुमान जी का गुणगान ही नहीं किया, बल्कि एक भक्त के हृदय की व्याकुलता और अटूट विश्वास को भी पिरो दिया। प्रारंभिक दोहे में गुरु-चरणों की वंदना से लेकर समापन दोहे में प्रभु राम, माता जानकी और लक्ष्मण जी सहित हृदय में वास करने की प्रार्थना तक—यह चालीसा संपूर्ण शरणागति का एक अलौकिक मार्ग है।

करोड़ों श्रद्धालु प्रतिदिन प्रातःकाल अपने दिन का शुभारंभ इस दिव्य स्तुति के साथ करते हैं। यह पाठ मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और हमें सिखाता है कि कितनी भी बड़ी चुनौती क्यों न हो, प्रभु के प्रति समर्पण और सेवा-भाव से हर बाधा को पार किया जा सकता है।

श्री हनुमान चालीसा पाठ करने की सही विधि एवं नियम

श्री हनुमान चालीसा का पाठ करते समय शुद्धता, एकाग्रता और समय की नियमितता का विशेष महत्व है:

  1. पवित्रता एवं समय: प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। लाल या पीले रंग के वस्त्र पाठ के समय अत्यंत शुभ माने जाते हैं।
  2. स्थान एवं दिशा: पूजा स्थल में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके लाल ऊनी आसन पर बैठें।
  3. दीपक एवं अर्पण: श्री हनुमान जी या प्रभु श्रीराम के चित्र के समक्ष शुद्ध घी अथवा चमेली के तेल का दीपक जलाएं। लाल पुष्प, तुलसी दल, सिंदूर और गुड़-चने या बूंदी का भोग अर्पित करें।
  4. पाठ का क्रम: सर्वप्रथम श्री गणेश जी और प्रभु श्रीराम का स्मरण करें। इसके पश्चात दोनों प्रारंभिक दोहे, फिर चालीस चौपाइयाँ और अंत में समापन दोहा पूरे भाव के साथ पढ़ें।
  5. आरती व क्षमा-प्रार्थना: पाठ संपन्न होने पर हनुमान जी की आरती करें और अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगते हुए संकट निवारण की प्रार्थना करें।

श्री हनुमान चालीसा पाठ के अद्भुत लाभ एवं महत्व

हनुमान चालीसा का नियमित और श्रद्धापूर्वक पाठ करने से साधक को निम्नलिखित विशिष्ट फल प्राप्त होते हैं:

  • भय और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति: “भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महाबीर जब नाम सुनावै” — चालीसा के पाठ से अज्ञात भय, बुरे स्वप्न और किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा का तत्काल निवारण होता है।
  • रोग एवं कष्टों का निवारण: “नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा” — निरंतर पाठ से मानसिक अवसाद दूर होता है और असाध्य रोगों से लड़ने की आंतरिक शक्ति प्राप्त होती है।
  • असाध्य कार्यों की सिद्धि: “दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते” — जीवन के रुके हुए और कठिन कार्य हनुमान जी की कृपा से सहजता से पूर्ण होते हैं।
  • आत्मविश्वास और बुद्धि-विकास: “बल बुधि विद्या देहु मोहिं” — विद्यार्थियों और युवाओं में एकाग्रता, निर्णय क्षमता और आत्मबल का तीव्र विकास होता है।
  • शनि व ग्रह दोषों से शांति: शनिवार और मंगलवार को पाठ करने से कुंडली के अशुभ ग्रह योग तथा शनि की साढ़ेसाती के कष्टों में अभूतपूर्व राहत मिलती है।

श्री हनुमान जी के अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)

हनुमान जी की संपूर्ण कृपा और संकट निवारण हेतु चालीसा के साथ इन पवित्र पाठों का भी नित्य पाठ करें:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र.हनुमान चालीसा का पाठ प्रतिदिन कितनी बार करना चाहिए?

दैनिक पूजा में 1, 3, 7 या 11 बार पाठ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। किसी विशेष संकट के समय या मनोकामना पूर्ति हेतु 100 बार पाठ ('जो सत बार पाठ कर कोई') करने का विधान है।

प्र.हनुमान चालीसा पाठ का सबसे उत्तम समय कौन सा है?

प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) अथवा संध्याकाल में गोधूलि वेला के समय पाठ करना सर्वश्रेष्ठ होता है। शांत वातावरण और शुद्ध मन से किया गया पाठ शीघ्र फल देता है।

प्र.क्या मंगलवार और शनिवार को हनुमान चालीसा का पाठ करना विशेष फलदायी है?

हाँ, मंगलवार और शनिवार श्री हनुमान जी की आराधना के विशेष दिन हैं। इन दिनों में लाल आसन पर बैठकर, चमेली के तेल या शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित कर पाठ करने से शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या सहित सभी ग्रह बाधाओं से राहत मिलती है।

प्र.क्या महिलाएं हनुमान चालीसा का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, माताएं और बहनें पूरी श्रद्धा, पवित्रता और भक्ति भाव से हनुमान चालीसा का पाठ कर सकती हैं। हनुमान जी बाल ब्रह्मचारी हैं और भक्तों को अपनी संतान या माता के रूप में देखते हैं, अतः शुद्ध हृदय से किया गया स्मरण सदैव कल्याणकारी है।

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