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दुर्गा आरती

दुर्गा आरती— अर्थ, लाभ एवं आरती विधि सहित

Durga Aarti

आदिशक्ति माँ जगदम्बा की यह पावन आरती (जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी) नित्य श्रद्धापूर्वक गाने से समस्त भय, संकट और दरिद्रता का नाश होता है तथा सुख, शांति और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

शिवानंद स्वामी६ मिनट पाठ

दुर्गा आरती संपूर्ण पाठ

पावन आरती पद सरल हिंदी भावार्थ सहित

टेक

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।

तुमको निसिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥

अर्थ: हे ममतामयी माँ अम्बे! हे जगतजननी माँ श्यामा गौरी! आपकी सदा ही जय हो, जय हो। भगवान विष्णु (हरि), सृष्टि-रचयिता ब्रह्मा जी और देवाधिदेव महादेव शिव जी नित्य-प्रतिदिन आपका ही ध्यान व गुणगान करते हैं। हे कल्याणी माता, हम बारंबार आपकी पावन आरती उतारते हैं।

पद १

माँग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को।

उज्ज्वल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥

अर्थ: हे माँ! आपके शीश की माँग में सौभाग्यसूचक दिव्य लाल सिन्दूर सुशोभित है और ललाट पर कस्तूरी (मृगमद) का पावन तिलक शोभायमान है। आपके दोनों दिव्य नेत्र अत्यंत उज्ज्वल व दयालु हैं और आपका मुखमंडल पूर्णिमा के शीतल चन्द्रमा के समान परम मनोहर व सुंदर है।

पद २

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।

रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥

अर्थ: हे जगदम्बे! आपका पावन श्रीअंग (कलेवर) तपे हुए शुद्ध सुवर्ण (सोने) के समान दमक रहा है और आप लाल रंग के दिव्य वस्त्र (रक्ताम्बर) धारण किए हुए हैं। आपके गले में सुगंधित लाल पुष्पों (गुड़हल/गुलाब) की सुंदर माला और मनोहर कंठहार सुशोभित है।

पद ३

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।

सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥

अर्थ: हे माँ भवानी! पराक्रमी सिंह (केहरि) आपका पावन वाहन है और आप अपने हाथों में दुष्टों के संहार हेतु खड्ग तथा खप्पर धारण किए हुए हैं। देवता, मनुष्य और मुनिजन सभी नित्य आपकी सेवा-आराधना करते हैं और आप अपने शरणागत भक्तों के समस्त दुखों को हरने वाली हैं।

पद ४

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।

कोटिक चन्द्र दिवाकर, सम राजत ज्योती॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥

अर्थ: हे माँ! आपके पावन कानों में स्वर्ण के सुंदर कुंडल झिलमिला रहे हैं और नासिका के अग्रभाग में अत्यंत सुंदर मुक्ता (मोती) शोभा पा रहा है। आपके दिव्य स्वरूप का तेज करोड़ों चन्द्रमाओं और करोड़ों सूर्यों के सम्मिलित प्रकाश के समान परम तेजस्वी है।

पद ५

शुम्भ-निशुम्भ विदारे, महिषासुर घाती।

धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥

अर्थ: हे महाशक्ति! आपने देवताओं को त्रस्त करने वाले महाक्रूर दैत्य शुम्भ और निशुम्भ का संहार किया तथा महिषासुर का वध करके धर्म की रक्षा की। जब आपने धूम्रलोचन का नाश किया, तब आपके दिव्य नेत्र क्रोध और विजय के अलौकिक तेज से मदमाते हो उठे।

पद ६

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।

मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥

अर्थ: हे चामुण्डा माँ! आपने दुष्ट चण्ड और मुण्ड का संहार किया तथा जिसके रक्त की प्रत्येक बूँद से नए दैत्य उत्पन्न होते थे, उस रक्तबीज (शोणित बीज) का समूल नाश किया। आपने मधु और कैटभ नामक महाबलशाली असुरों का वध करके समस्त देवगणों को भयमुक्त किया।

पद ७

ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी।

आगम-निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥

अर्थ: हे माँ! आप ही ब्रह्मा जी की शक्ति ब्रह्माणी हैं, भगवान शिव की शक्ति रुद्राणी हैं और भगवान विष्णु की अर्धांगिनी माँ महालक्ष्मी (कमला रानी) हैं। वेद, पुराण और समस्त शास्त्र (आगम-निगम) आपके ही अलौकिक ऐश्वर्य का बखान करते हैं; आप देवाधिदेव महादेव की प्रधान पटरानी हैं।

पद ८

चौंसठ योगिनि मंगल गावत, नृत्य करत भैरों।

बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥

अर्थ: हे आदिशक्ति! आपके दरबार में चौंसठ योगिनियाँ परम मंगलकारी गीत गाती हैं और भगवान भैरव आनंदविभोर होकर नृत्य करते हैं। वहाँ करताल, मृदंग, झांझ और भगवान शिव का डमरू अलौकिक भक्ति रस में बज रहा है।

पद ९

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।

भक्तन की दुःख हरता, सुख सम्पति करता॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥

अर्थ: हे जगदम्बा! आप ही इस चराचर जगत की परम जननी (माता) हैं और आप ही सबका पालन-पोषण करने वाली (भरता) हैं। आप अपने निष्कपट भक्तों के सारे कष्टों, संतापों और संकटों को हरकर उन्हें सुख, समृद्धि और संपूर्ण ऐश्वर्य प्रदान करती हैं।

पद १०

भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी।

मनवांछित फल पावत, सेवत नर-नारी॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥

अर्थ: हे माँ भवानी! आपकी चारों भुजाएँ अत्यंत सुशोभित हैं, जिनमें आप भक्तों को अभय और अभीष्ट वरदान देने वाली वर-मुद्रा धारण किए हुए हैं। जो भी नर-नारी पूर्ण श्रद्धा और पवित्र भाव से आपकी सेवा-उपासना करते हैं, वे अपनी मनोकामना के अनुसार मनवांछित फल प्राप्त करते हैं।

पद ११

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।

श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥

अर्थ: हे माँ! आपके पावन पूजन हेतु सोने (कंचन) की सुंदर थाल सजी हुई है, जिसमें सुवासित अगर और कपूर की पवित्र बत्तियाँ प्रज्वलित हैं। आपके पावन धाम श्रीमालकेतु में करोड़ों रत्नों के समान अलौकिक दिव्य ज्योतियों का प्रकाश जगमगा रहा है।

पद १२

श्री अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावे।

कहत शिवानंद स्वामी, सुख-सम्पति पावे॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥

अर्थ: माँ भगवती अम्बे जी की यह परम पावन आरती जो भी मनुष्य नित्य-नियम से प्रेमपूर्वक गाता है, स्वामी शिवानंद जी कहते हैं कि वह इस संसार में समस्त सुख, शांति, समृद्धि और अंत में माता के परम धाम को प्राप्त करता है।

श्री दुर्गा आरती (जय अम्बे गौरी) का महत्व एवं परिचय

सनातन धर्म की पावन परंपरा में आदिशक्ति माँ भगवती जगदम्बा संपूर्ण सृष्टि की मूल चेतना, प्राण-ऊर्जा और ममतामयी जननी हैं। जब-जब ब्रह्मांड में दैत्य प्रवृत्तियाँ, अधर्म और संकट बढ़ते हैं, तब-तब माँ भवानी अपने भक्तों की रक्षा और धर्म की पुनर्स्थापना हेतु अवतरित होती हैं। ‘जय अम्बे गौरी’ (Jai Ambe Gauri) आरती माँ दुर्गा की वह सर्वमान्य एवं सर्वप्रिय स्तुति है, जो सदियों से भारत के हर देवालय और सनातन गृहस्थ के पूजा-कक्ष में गूंजती आ रही है।

इस पावन आरती की प्रत्येक पंक्ति में माँ दुर्गा के अलौकिक स्वरूप, दिव्य अस्त्रों, उनकी पराक्रमी लीलाओं और त्रिदेवी ऐक्य का भावपूर्ण दर्शन होता है। स्वामी शिवानंद जी द्वारा रचित इस आरती में जहाँ एक ओर माँ के ललाट पर कस्तूरी तिलक और स्वर्णिम कांति का अनुपम श्रृंगारिक वर्णन है, वहीं दूसरी ओर महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ, चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज जैसे महाबलशाली असुरों के संहारक रूप की जयकार है।

आरती केवल एक धार्मिक विधि नहीं, बल्कि भक्त का अपने आराध्य के प्रति संपूर्ण समर्पण है। जब हम संध्या समय या नवरात्रि के महापर्व पर माँ अम्बे की ज्योति प्रज्वलित कर समवेत स्वर में इस आरती का गान करते हैं, तो अंतःकरण के सारे भय, संशय और मानसिक अवसाद तिरोहित हो जाते हैं। माँ की करुणामयी दृष्टि साधक के जीवन में अभय, उत्साह और आत्मबल का संचार करती है।

श्री दुर्गा आरती करने की सही विधि एवं नियम

माँ जगदम्बा की पूजा-आरती में भाव और पवित्रता का सर्वाधिक महत्व है। शास्त्रसम्मत विधि से की गई आरती शीघ्र फलदायी होती है:

  1. पवित्रता एवं समय: आरती से पूर्व स्नान कर स्वच्छ, धुले हुए पवित्र वस्त्र धारण करें (लाल या पीले वस्त्र सर्वोत्तम हैं)। प्रातःकाल की पूजा के उपरांत या संध्याकाल में जब सूर्य अस्त हो रहा हो, तब आरती करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है।
  2. दिशा एवं स्थान: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा अथवा ऊन के पवित्र आसन पर खड़े हों। माँ दुर्गा के चित्र या श्रीविग्रह को सुंदर लाल पुष्पों (विशेषकर लाल गुड़हल या गुलाब) से सुसज्जित करें।
  3. आरती की थाली सजाना: पीतल, तांबे या चांदी की थाली में कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं। उस पर अक्षत, पुष्प, धूप, नैवेद्य (मिश्री, बताशा, मौसमी फल या हलवा) रखें। थाली के मध्य में शुद्ध गाय के घी का दीपक या कपूर स्थापित करें।
  4. आरती घुमाने की विधि: आरती की थाल को दोनों हाथों से थामकर माँ के विग्रह के समक्ष ॐ के आकार में दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) घुमाएं। चार बार चरणों में, दो बार नाभि पर, एक बार मुखारविंद पर और सात बार सम्पूर्ण श्रीविग्रह पर आरती घुमाने का विधान है।
  5. आरती समर्पण एवं प्रदक्षिणा: आरती पूर्ण होने पर आचमनी या शंख से जल घुमाकर धरती पर छोड़ें (पुष्पांजलि अर्पित करें)। तदुपरांत दोनों हाथों से आरती की पावन लौ का स्पर्श कर अपने नेत्रों और मस्तक पर लगाएं। अंत में अपने स्थान पर ही दक्षिणावर्त दिशा में घूमकर प्रदक्षिणा करें।

श्री दुर्गा आरती पाठ के अद्भुत लाभ एवं महत्व

माँ दुर्गा की यह पावन आरती नित्य नियमपूर्वक गाने से साधक को निम्नलिखित आध्यात्मिक एवं भौतिक वरदान प्राप्त होते हैं:

  • भय, शत्रु-बाधा और घोर संकटों से मुक्ति: आरती में स्पष्ट वर्णित है — “शुम्भ-निशुम्भ विदारे, महिषासुर घाती” तथा “सुर भयहीन करे”। माँ का यह संहारक और रक्षक स्वरूप जीवन के समस्त ज्ञात-अज्ञात भयों, दुष्ट बाधाओं और नकारात्मक प्रभावों को क्षणभर में भस्म कर देता है।
  • अखंड सौभाग्य, ओज और तेज की प्राप्ति: आरती की पावन पंक्ति — “माँग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को” — का ध्यान करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और साधक के मुखमंडल पर आंतरिक आभा, आत्मविश्वास व तेज का विस्तार होता है।
  • समस्त दरिद्रता का नाश और सुख-समृद्धि का वास: माँ का त्रिदेवी स्वरूप वंदित है — “भक्तन की दुःख हरता, सुख सम्पति करता”। माँ कमला (महालक्ष्मी) के रूप में भक्तों के घरों से दरिद्रता दूर कर धन, धान्य और ऐश्वर्य का भंडार भरती हैं।
  • मनोकामनाओं की पूर्णता और मोक्ष की प्राप्ति: “मनवांछित फल पावत, सेवत नर-नारी” — जो साधक निष्कपट भाव से माँ की शरण में आता है, उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की सुलभ सिद्धि प्राप्त होती है।
  • समस्त व्याधियों और क्लेशों का शमन: आरती के समापन पर कहा गया है — “कहत शिवानंद स्वामी, सुख-सम्पति पावे”। नित्य आरती के प्रभाव से घर-परिवार में कलह-क्लेश शांत होते हैं, मानसिक शांति मिलती है और परिवार में स्नेह व मंगल का वातावरण बनता है।

माँ दुर्गा के अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)

माँ दुर्गा की पूर्ण कृपा प्राप्त करने हेतु नित्य पूजा में इन पावन पाठों का भी स्वाध्याय करें:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र.दुर्गा आरती (जय अम्बे गौरी) कब और किस समय करनी चाहिए?

माँ दुर्गा की आरती नित्य प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त अथवा संध्याकाल में सूर्यास्त के उपरांत (गोधूलि वेला) करनी चाहिए। विशेष रूप से शुक्रवार, मंगलवार, अष्टमी, नवमी तिथि एवं नवरात्रि के पावन दिनों में आरती करने का अनंत गुना फल मिलता है।

प्र.माँ दुर्गा की आरती करते समय दीपक कैसा होना चाहिए?

आरती हेतु शुद्ध गाय के घी का एक या पंचमुखी दीपक अथवा शुद्ध भीमसेनी कपूर की बाती का उपयोग करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है। पीतल या चांदी की थाली में अगर-कपूर सजाकर आरती करने से वातावरण की समस्त नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो जाती है।

प्र.जय अम्बे गौरी आरती के रचयिता कौन हैं?

इस सर्वप्रिय पावन आरती के रचयिता महान देवी-भक्त स्वामी शिवानंद जी हैं। आरती के अंतिम पद में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है — *'श्री अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी, सुख-सम्पति पावे॥'*

प्र.नित्य दुर्गा आरती करने से क्या विशेष फल मिलता है?

नित्य श्रद्धापूर्वक दुर्गा आरती गाने से साधक को भय, शत्रु-बाधा, तंत्र-दोष एवं घोर संकटों से मुक्ति मिलती है। घर में सुख, शांति, धन-वैभव, आरोग्य और माँ जगदम्बा की अखंड कृपा का वास होता है।

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