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गणेश आरती (Ganesh Aarti — पावन आरती पद सरल हिंदी भावार्थ सहित)
गणेश आरती— अर्थ, लाभ एवं आरती विधि सहित
Ganesh Aarti
प्रथम पूज्य, विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की यह सर्वप्रिय पावन आरती (जय गणेश जय गणेश देवा) हर शुभ कार्य के आरंभ में विघ्नों के नाश, सुख-समृद्धि और मंगल की प्राप्ति हेतु गाई जाती है।
गणेश आरती संपूर्ण पाठ
पावन आरती पद सरल हिंदी भावार्थ सहित
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
अर्थ: हे विघ्नहर्ता, मंगलकारी भगवान श्री गणेश! आपकी सदा ही जय हो, जय हो, जय हो। जिनकी ममतामयी माता साक्षात् आदिशक्ति पार्वती हैं और परम कृपालु पिता देवाधिदेव महादेव शिवशंकर हैं, उन प्रथम पूज्य देव गणेश जी की हम बारंबार वंदना करते हैं।
एक दन्त दयावन्त, चार भुजा धारी।
माथे सिन्दूर सोहे, मूसे की सवारी॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
अर्थ: हे दया के सागर प्रभु! आपका एकदंत स्वरूप अलौकिक है और आप अपनी चारों भुजाओं में पाश, अंकुश, मोदक और अभय-मुद्रा धारण किए हुए हैं। आपके सुंदर ललाट पर दिव्य लाल सिंदूर सुशोभित है और नन्हा मूषक (चूहा) आपका पावन वाहन है। हे माँ पार्वती व भगवान शिव के प्रिय सुत, आपकी सदा जय हो।
पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
अर्थ: आपकी पावन पूजा में तांबूल (पान), सुगंधित पुष्प और नाना प्रकार के सूखे मेवे श्रद्धापूर्वक अर्पित किए जाते हैं। आपको अत्यंत प्रिय मोदक और मोतीचूर के लड्डुओं का भोग लगाया जाता है, तथा समस्त साधु, संत और भक्तजन भावविभोर होकर आपकी सेवा में लीन रहते हैं।
अन्धन को आँख देत, कोढ़िन को काया।
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
अर्थ: आपकी कृपा अपरंपार है—आप दृष्टिहीनों को दिव्य ज्योति (नेत्र) प्रदान करते हैं, व्याधिग्रस्त रोगियों को निरोगी व सुंदर काया देते हैं, संतानहीन माताओं को सुयोग्य संतान का वरदान देते हैं और निर्धनों की दरिद्रता हरकर उन्हें सुख, समृद्धि व धन-वैभव प्रदान करते हैं।
'सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
दीनन की लाज राखो, शम्भु सुत वारी॥
कामना को पूर्ण करो, जाऊँ बलिहारी।
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
अर्थ: भक्तजन (कवि सूरश्याम के भाव में) दीनभाव से आपकी शरण में आए हैं, हे प्रभु हमारी इस तुच्छ पूजा-अर्चना को स्वीकार कर सफल कीजिए। हे शंभु-पुत्र! हम असहायों और दीनों की लाज रखिए तथा हमारे सभी सात्विक मनोरथों को पूर्ण कीजिए; हम आपके इस करुणामयी मंगल स्वरूप पर बारंबार बलिहारी जाते हैं।
श्री गणेश आरती का महत्व एवं परिचय
सनातन धर्म में किसी भी शुभ कार्य, अनुष्ठान, विद्यारंभ अथवा नए व्यापार का श्रीगणेश करने से पूर्व विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश का स्मरण और वंदन अनिवार्य माना गया है। भगवान गणेश केवल एक देवता नहीं, बल्कि चेतना के मूल आधार, विवेक के स्वामी और हर मार्ग के समस्त अवरोधों को हरने वाले मंगलमूर्ति हैं। जब भी भक्त किसी नए संकल्प के साथ जीवन में आगे बढ़ता है, तो श्री गणेश का नाम उसके भीतर असीम उत्साह, बुद्धि और निर्भयता का संचार करता है।
‘जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा’ केवल एक पारंपरिक आरती नहीं, बल्कि करोड़ों भक्तों के हृदय की वह सहज पुकार है जो भारत के हर घर और मंदिर में प्रतिदिन प्रातः-सायं गूंजती है। जब दीपक की लौ के सम्मुख करताल और घंटियों की मधुर ध्वनि के साथ यह आरती गाई जाती है, तो वातावरण की समस्त नकारात्मक ऊर्जा स्वतः विलीन हो जाती है।
माता पार्वती के वात्सल्य और महादेव के तेज से प्रकट हुए गजानन का यह पावन स्वरूप हमें सिखाता है कि विनम्रता, विवेक और निष्ठा के साथ किया गया कोई भी कार्य कभी निष्फल नहीं होता।
श्री गणेश आरती करने की सही विधि एवं नियम
भगवान श्री गणेश की आरती अत्यंत सरल, सात्विक और फलदायी है। आरती करते समय निम्नलिखित नियमों का पालन करें:
- पवित्रता एवं समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय अथवा सायंकाल गोधूलि वेला में स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र (पीले या लाल रंग के वस्त्र विशेष शुभ) धारण करें। बुधवार और संकष्टी चतुर्थी पर आरती का विशेष महत्व है।
- आरती की थाली की तैयारी: तांबे, पीतल या चांदी की थाली में शुद्ध गाय के घी का दीपक या शुद्ध भीमसेनी कर्पूर स्थापित करें। थाली में रोली, अक्षत, सुगंधित पुष्प और गणेश जी की अतिप्रिय दूर्वा (दूब घास) अवश्य रखें।
- तुलसी दल का निषेध: यह शास्त्रीय नियम सदैव स्मरण रखें कि भगवान गणेश की पूजा, भोग या आरती में कभी भी तुलसी पत्र अर्पित न करें।
- आरती घुमाने का विधान: आरती की थाली को भगवान गणेश के चरणों में चार बार, नाभि मंडल के सम्मुख दो बार, मुखारविंद के सामने एक बार तथा संपूर्ण दिव्य विग्रह के समक्ष सात बार घड़ी की सुई की दिशा (Clockwise) में भावपूर्वक घुमाएं।
- भोग एवं समर्पण: आरती संपन्न होने के पश्चात मोदक, मोतीचूर के लड्डू या ऋतुफल का भोग लगाएं। इसके उपरांत दोनों हाथों से आरती ग्रहण करें और सभी उपस्थित जनों में प्रसाद वितरित करें।
श्री गणेश आरती गान के अद्भुत लाभ एवं महत्व
श्री गणेश आरती का नित्य सस्वर गान करने से भक्त के लौकिक एवं आध्यात्मिक जीवन में निम्नलिखित चमत्कारी परिवर्तन आते हैं:
- समस्त कार्यों की निर्विघ्न सिद्धि: “एक दन्त दयावन्त, चार भुजा धारी” — गजानन की कृपा से जीवन की कठिन से कठिन बाधाएं, कानूनी अड़चनें और व्यापारिक रुकावटें समाप्त हो जाती हैं।
- आरोग्य एवं शारीरिक व्याधियों से मुक्ति: “अन्धन को आँख देत, कोढ़िन को काया” — नित्य आरती के श्रवण और गान से मानसिक तनाव दूर होता है और असाध्य रोगों में चमत्कारी स्वास्थ्य लाभ मिलता है।
- संतान सुख एवं पारिवारिक कल्याण: “बाँझन को पुत्र देत” — संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपतियों के लिए गणेश जी की नित्य आरती और मोदक भोग अत्यंत कल्याणकारी सिद्ध होता है।
- अक्षय धन, वैभव एवं दरिद्रता-नाश: “निर्धन को माया” — घर और कार्यस्थल में नित्य आरती होने से माँ लक्ष्मी और रिद्धि-सिद्धि का स्थायी वास होता है तथा दरिद्रता का समूल नाश होता है।
- समस्त मनोरथों की पूर्ति एवं ईश्वरीय कृपा: “कामना को पूर्ण करो, जाऊँ बलिहारी” — भक्त के समस्त सात्विक संकल्प पूर्ण होते हैं और परिवार में शांति, सौहार्द्र तथा प्रेम का वातावरण बना रहता है।
भगवान गणेश के अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)
प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश एवं शिव परिवार की संपूर्ण कृपा प्राप्त करने हेतु इन पवित्र पाठों का भी नित्य पाठ करें:
- श्री गणेश चालीसा पाठ (Ganesh Chalisa in Hindi) — विघ्नहर्ता भगवान गणेश का संपूर्ण चालीसा पाठ, दोहा-चौपाई अर्थ सहित।
- संकटनाशन गणेश स्तोत्र (Sankat Nashan Ganesh Stotra in Hindi) — नारद पुराणोक्त संकटों को हरने वाला दिव्य स्तोत्र।
- श्री शिव चालीसा पाठ (Shiv Chalisa in Hindi) — देवाधिदेव भगवान शिव का संपूर्ण स्तुति पाठ।
- श्री दुर्गा चालीसा पाठ (Durga Chalisa in Hindi) — आदिशक्ति माँ जगदम्बा का पावन चालीसा पाठ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्र.श्री गणेश जी की आरती (जय गणेश देवा) का पाठ कब और किस अवसर पर करना चाहिए?
भगवान श्री गणेश प्रथम पूज्य देव हैं, इसलिए किसी भी नए कार्य के शुभारंभ, गृह प्रवेश, व्यापार आरंभ, दैनिक प्रातः-संध्या पूजन और विशेष रूप से बुधवार तथा गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर गणेश आरती अवश्य करनी चाहिए। सनातन परंपरा में किसी भी अन्य देवी-देवता की पूजा या आरती से पूर्व सबसे पहले श्री गणेश जी की आरती करने का विधान है।
प्र.गणेश जी की आरती करते समय थाली में कौन सी सामग्री रखनी चाहिए और क्या वर्जित है?
गणेश आरती हेतु पीतल या तांबे की थाली में शुद्ध गाय के घी का दीपक या कर्पूर, लाल चंदन, कुमकुम, अक्षत और दूर्वा (दूब घास) अवश्य रखें। विशेष ध्यान रखें कि भगवान गणेश की पूजा व आरती में तुलसी दल का प्रयोग पूर्णतः वर्जित माना गया है; भोग के लिए मोदक या मोतीचूर के लड्डू अर्पित करें।
प्र.आरती की पावन पंक्ति 'सूर श्याम शरण आए' का क्या भावार्थ है?
इस पंक्ति में भक्त कवि द्वारा भगवान गणेश के चरणों में पूर्ण शरणागति और अनन्य भक्ति का भाव प्रकट किया गया है। इसका अर्थ है कि हे विघ्नहर्ता, हम सांसारिक जीव अपने समस्त अहंकार को त्यागकर आपकी शरण में आए हैं; हमारे अवगुणों को क्षमा कर हमारी इस सेवा को स्वीकार कीजिए और जीवन के संकटों से हमारी रक्षा कीजिए।
प्र.नित्य श्री गणेश आरती का गान करने से साधक को क्या लाभ प्राप्त होते हैं?
आरती की पावन पंक्ति 'अन्धन को आँख देत, कोढ़िन को काया, बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया' के अनुसार, नित्य गणेश आरती गाने से जीवन के समस्त विघ्न और संकट समाप्त होते हैं, आरोग्य की प्राप्ति होती है, संतान सुख मिलता है और घर में रिद्धि-सिद्धि तथा अक्षय धन-समृद्धि का वास होता है।
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