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विष्णु आरती

ॐ जय जगदीश हरे— अर्थ, लाभ एवं आरती विधि सहित

Om Jai Jagdish Hare

जगत के पालनहार, करुणा-निधान भगवान विष्णु (श्री जगदीश जी) की यह सर्वप्रिय और मंगलकारी आरती जो हर घर में सुख, शांति और समृद्धि का संचार करती है।

पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी६ मिनट पाठ

ॐ जय जगदीश हरे संपूर्ण पाठ

पावन आरती पद सरल हिंदी भावार्थ सहित

टेक

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।

भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,

क्षण में दूर करे। ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: हे संपूर्ण चराचर जगत के स्वामी और पालनहार भगवान श्री जगदीश (विष्णु)! आपकी सदा ही जय हो। आप अपने अनन्य भक्तों और शरणागत सेवकों के समस्त संकटों, विपत्तियों और दुखों को एक क्षण में दूर करने वाले हैं। हे करुणामय प्रभु, आपकी जय हो।

पद १

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।

स्वामी दुःख विनसे मन का।

सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का।

ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: जो भी भक्त सच्चे भाव और निष्ठा से आपका ध्यान करता है, वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है तथा उसके मन के समस्त संताप, भय और मानसिक क्लेश विनष्ट हो जाते हैं। उसके घर में सुख, समृद्धि और आनंद का वास होता है तथा शरीर के समस्त रोग और शारीरिक कष्ट मिट जाते हैं।

पद २

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी।

स्वामी शरण गहूं मैं किसकी।

तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी।

ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: हे प्रभु, आप ही मेरे परम माता और पिता हैं; आपके अतिरिक्त मैं इस संसार में और किसकी शरण ग्रहण करूँ? आपके सिवा मेरा इस ब्रह्मांड में कोई अन्य रक्षक और आश्रय नहीं है, जिससे मैं किसी सहायता या कृपा की आस रख सकूँ।

पद ३

तुम पूरन परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।

स्वामी तुम अन्तर्यामी।

पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी।

ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: आप ही सर्वव्यापी, परिपूर्ण परमात्मा हैं और समस्त प्राणियों के हृदय के गुप्त भावों को जानने वाले अन्तर्यामी हैं। आप ही सनातन पारब्रह्म, देवाधिदेव परमेश्वर हैं और संपूर्ण सृष्टि के एकछत्र अधिपति और स्वामी हैं।

पद ४

तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता।

स्वामी तुम पालन-कर्ता।

मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता।

ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: हे स्वामी, आप अपार दया और करुणा के अथाह सागर हैं और समस्त चराचर जीवों का वात्सल्यपूर्वक पालन-पोषण करने वाले हैं। मैं अज्ञानी, दुर्बुद्धि और सांसारिक कामनाओं से ग्रस्त क्षुद्र जीव हूँ; हे मेरे पालनहार ईश्वर, अपनी अहैतुकी दया से मुझ दीन पर कृपा कीजिए।

पद ५

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।

स्वामी सबके प्राणपति।

किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति।

ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: हे परमात्मा, आप सूक्ष्म और भौतिक इन्द्रियों की पहुंच से परे (अगोचर) हैं तथा संसार के समस्त प्राणियों के प्राणों के स्वामी व आधार हैं। मुझ जैसी कुबुद्धि और अज्ञानी आत्मा को आपकी प्राप्ति की कोई साधना या विधि ज्ञात नहीं है; हे दयामय प्रभु, आप स्वयं ही मुझे अपनी शरण में स्वीकार कीजिए।

पद ६

दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।

स्वामी तुम ठाकुर मेरे।

अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे।

ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: हे दीनों और असहायों के सच्चे बंधु, आप ही मेरे दुखों और संकटों का हरण करने वाले सर्वसमर्थ आराध्य स्वामी हैं। मैं अपनी सारी आशाएं छोड़कर आपके पावन द्वार पर शरणागत पड़ा हूँ; कृपा करके अपना अभय वरदहस्त मेरे सिर पर रखकर मुझे भवसागर से पार उतारिए।

पद ७

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।

स्वामी पाप हरो देवा।

श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा।

ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: हे देवाधिदेव, मेरे मन से काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि समस्त सांसारिक विषय-विकारों और दुर्गुणों को दूर कर दीजिए और मेरे समस्त पापों का नाश कीजिए। मेरे हृदय में अपने पावन चरणों के प्रति निष्काम श्रद्धा व अनन्य भक्ति का विस्तार कीजिए तथा मुझे साधु-संतों व परोपकार की सेवा का वरदान दीजिए।

समर्पण

तन-मन-धन सब कुछ है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा।

तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा।

ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: हे प्रभु, यह नश्वर शरीर, यह चंचल मन और जो भी सांसारिक धन-वैभव मेरे पास है, वह सब वास्तव में आपकी ही दी हुई धरोहर है। जब सब कुछ आपका ही है, तो जो आपका है वह मैं आपको ही श्रद्धापूर्वक समर्पित करता हूँ; इसमें मेरा अपना कुछ भी नहीं है।

फलश्रुति

श्री जगदीश जी की आरती, जो कोई नर गावे।

स्वामी जो कोई नर गावे।

कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावे।

ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: भगवान श्री जगदीश जी की इस दिव्य और पावन आरती का जो भी भक्त नित्य प्रेम, श्रद्धा और एकाग्र चित्त से गान करता है, वह जीवन के समस्त क्लेशों और संतापों से मुक्त होकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के समस्त मनवांछित फलों को प्राप्त करता है।

श्री जगदीश जी की आरती का महत्व एवं परिचय

सनातन धर्म की पावन पूजा परंपरा में ॐ जय जगदीश हरे (Om Jai Jagdish Hare Aarti) वह परम पावन स्तुति है, जिसकी गूंज भारतवर्ष के हर मंदिर, देवालय और गृहस्थ के पूजा घर में प्रतिदिन सुनाई देती है। जब संध्या वेला में ढोल-मंजीरों, शंख की पवित्र ध्वनि और घंटी के मधुर नाद के साथ यह आरती आरंभ होती है, तो संपूर्ण परिवेश एक अलौकिक शांति और भक्ति रस में डूब जाता है। यह केवल कुछ छंदों का गायन नहीं, बल्कि जीव का अपने परम पिता, जगत के पालनहार श्री हरि विष्णु के चरणों में पूर्ण शरणागति का जीवंत उद्घोष है।

क्षीरसागर में अनंत शेषनाग की शय्या पर विश्राम करने वाले, चतुर्भुज रूप में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाले भगवान विष्णु संपूर्ण सृष्टि के संचालक और रक्षक हैं। जब भी भक्त के जीवन में कोई संकट, अंधकार या निराशा घेरती है, तो भगवान जगदीश की यह आरती उसके हृदय में आशा, साहस और दैवीय संरक्षण का दीपक प्रज्वलित करती है। इस आरती की रचना उन्नीसवीं सदी (सन् 1870) में पंजाब के प्रख्यात सनातन मनीषी पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी ने की थी। उन्होंने इतनी सहज, संगीतमय और भावपूर्ण भाषा में इसे ढाला कि भाषा और क्षेत्र की सीमाओं को तोड़कर यह संपूर्ण सनातनी जनमानस का हृदय-गीत बन गई।

इस आरती की सबसे बड़ी विशेषता इसका समर्पण भाव है। जहाँ सांसारिक कामनाएं मनुष्य को बांधती हैं, वहीं यह आरती भक्त को यह बोध कराती है कि ‘मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी’—अर्थात इस नश्वर संसार में एकमात्र शाश्वत सहारा केवल और केवल परमात्मा ही हैं। जब हम अपने अहंकार को त्यागकर सब कुछ प्रभु को सौंप देते हैं, तब हमारे जीवन का संपूर्ण भार स्वयं भगवान अपने कंधों पर उठा लेते हैं।

ॐ जय जगदीश हरे आरती करने की सही विधि एवं नियम

भगवान श्री जगदीश जी की आरती को शास्त्रोक्त विधि और एकाग्र भक्ति भाव से करने पर उसका फल कई गुना बढ़ जाता है। आरती करते समय निम्नलिखित नियमों का पालन करें:

  1. पवित्रता एवं स्नान: आरती से पूर्व स्नानादि कर स्वच्छ वस्त्र (संभव हो तो भगवान विष्णु के प्रिय पीले वस्त्र) धारण करें। आचमन कर स्वयं को बाह्य और आंतरिक रूप से शुद्ध करें।
  2. आरती थाली की सज्जा: पीतल, कांसा या चांदी की स्वच्छ थाली में गाय के शुद्ध घी का दीपक अथवा शुद्ध भीमसेनी कर्पूर रखें। थाली में कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं, उस पर पीले अक्षत, पीले पुष्प और भगवान का प्रिय तुलसी दल अर्पित करें।
  3. आरती घुमाने की विधि: आरती की थाली को भगवान की प्रतिमा के सम्मुख ‘ॐ’ के आकार में या दक्षिणावर्त (Clockwise) दिशा में घुमाना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार सबसे पहले भगवान के श्रीचरणों में ४ बार, नाभि कमल के सम्मुख २ बार, मुखारविंद के सम्मुख १ बार और अंत में संपूर्ण विग्रह के चारों ओर ७ बार थाली को प्रेमपूर्वक घुमाना चाहिए।
  4. सामूहिक गान एवं ताल: आरती को कभी भी जल्दबाजी या कर्कश स्वर में न गाएं। लयबद्ध, शांत और स्पष्ट उच्चारण के साथ परिवार सहित एक स्वर में गान करें।
  5. आरती ग्रहण एवं परिक्रमा: आरती पूर्ण होने के उपरांत आचमनी से जल की तीन धाराएं थाली के चारों ओर घुमाकर धरती पर छोड़ें। इसके बाद आरती की ज्योति पर दोनों हाथ फेरकर अपने सिर और नेत्रों से लगाएं। अंत में अपने ही स्थान पर दक्षिणावर्त ३ बार घूमकर परिक्रमा करें और क्षमा-प्रार्थना करें।

ॐ जय जगदीश हरे आरती के अद्भुत लाभ एवं महत्व

नित्य श्रद्धापूर्वक श्री जगदीश आरती का श्रवण और गान करने से जीवन में अद्भुत आध्यात्मिक और लौकिक परिवर्तन अनुभव होते हैं:

  • समस्त संकटों और विघ्नों का नाश: आरती की टेक पंक्ति ‘भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे’ के अनुसार जो भक्त प्रभु की शरण लेता है, उसके जीवन की कठिन से कठिन बाधाएं और विपत्तियां प्रभु की कृपा से क्षण भर में दूर हो जाती हैं।
  • पारिवारिक सुख-शांति एवं आरोग्यता: ‘सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का’—इस पावन छंद के नित्य पाठ से घर में नकारात्मक ऊर्जा और वास्तु दोष समाप्त होते हैं, पारिवारिक कलह दूर होती है तथा असाध्य व्याधियों और शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।
  • मानसिक शांति और विकारों का शमन: ‘विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा’ पंक्ति का ध्यान करते हुए आरती करने से काम, क्रोध, लोभ और अहंकार जैसे आंतरिक शत्रु शांत होते हैं, मन में सात्विक विचारों का उदय होता है और अंतःकरण निर्मल बनता है।
  • परम शरणागति और अहंकार मुक्ति: ‘तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा’—यह दिव्य भाव भक्त को यह सिखाता है कि जो कुछ भी हमारे पास है, वह प्रभु की ही कृपा है। इस भाव से जीने वाला व्यक्ति चिंता, तनाव और भय से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।
  • साधु-सेवा और सद्गुणों का विकास: ‘श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा’—भगवान की आरती मनुष्य के भीतर धर्म, दया, परोपकार और सेवा का पावन संस्कार जाग्रत करती है, जिससे उसका यह लोक और परलोक दोनों संवर जाते हैं।

भगवान विष्णु के अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र.ॐ जय जगदीश हरे आरती के मूल रचयिता कौन हैं और यह कब लिखी गई?

ॐ जय जगदीश हरे आरती की रचना सन् 1870 के आसपास पंजाब के प्रसिद्ध विद्वान और साहित्यकार पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी (Pandit Shradha Ram Phillauri) ने की थी। उन्होंने सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार और गृहस्थों में भक्ति भाव जगाने के लिए इस सरल और भावपूर्ण आरती की रचना की, जो आज संपूर्ण विश्व में भगवान विष्णु की सबसे लोकप्रिय और सर्वमान्य आरती बन चुकी है।

प्र.भगवान विष्णु की आरती करने का सबसे उत्तम समय और दिशा कौन सी है?

भगवान विष्णु (श्री जगदीश जी) की आरती करने का सबसे श्रेष्ठ समय प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त/सूर्योदय के पश्चात तथा विशेष रूप से सायंकाल गोधूलि वेला में संध्‍या वंदन के समय माना गया है। आरती करते समय मुख पूर्व दिशा (East) या ईशान कोण (North-East) की ओर होना चाहिए, जो सकारात्मक ऊर्जा और देव-कृपा का केंद्र है।

प्र.आरती की थाली में किन-किन पावन सामग्रियों का होना आवश्यक है?

भगवान जगदीश की आरती हेतु पीतल, तांबे या चांदी की स्वच्छ थाली में शुद्ध गाय के घी का पंचमुखी दीपक या कर्पूर रखना चाहिए। साथ में रोली, चंदन, अक्षत, भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय पीले पुष्प या गेंदे की माला, और आचमन हेतु शुद्ध जल अवश्य रखें। ध्यान रहे कि भगवान विष्णु के किसी भी भोग या पूजा में तुलसी दल का होना अनिवार्य माना गया है।

प्र.नित्य ॐ जय जगदीश हरे आरती गाने से क्या आध्यात्मिक लाभ मिलता है?

आरती की पावन पंक्ति *'जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का'* के अनुसार नित्य आरती गाने से घर का वास्तु दोष और कलह शांत होता है, मानसिक तनाव और शारीरिक रोगों का निवारण होता है तथा परिवार में सुख-समृद्धि आती है। यह आरती भक्त के भीतर *'तेरा तुझको अर्पण'* का निष्काम शरणागति भाव जगाकर उसे जन्म-मरण के भवबंधन से मुक्ति का मार्ग दिखाती है।

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