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बृहस्पति

श्री बृहस्पति चालीसा— अर्थ, लाभ एवं पाठ विधि सहित

Brihaspati Chalisa (Hindi Lyrics, Meaning & PDF)

देवताओं के परम गुरु श्री बृहस्पति देव की पावन वंदना — नित्य पाठ से ज्ञान, सद्विवेक, विद्या, वैवाहिक सुख और गुरु दोष का निवारण होता है।

परंपरागत७ मिनट पाठ

श्री बृहस्पति चालीसा संपूर्ण पाठ

दोहा एवं ४० चौपाइयाँ सरल हिंदी भावार्थ सहित

प्रारंभिक दोहा

शीश नवाय पद पद्म भजि, विमल ज्ञान सुख खान।

कृपा सिन्धु संशय हरन, कीजै विमल कल्यान॥

अर्थ: सुखों की खान और निर्मल ज्ञान के भंडार श्री बृहस्पति देव के पावन चरण कमलों में शीश नवाकर मैं वंदना करता हूँ। हे कृपा के सिंधु और समस्त संशयों व भयों का हरण करने वाले गुरुदेव! मुझ पर कृपा कर मेरा परम कल्याण कीजिए।

जय बृहस्पति देवा प्रभु, सुनहु विनय चित लाय।

कृपा करहु गुरुदेव अब, प्रभु पद भक्ति बढ़ाय॥

अर्थ: हे प्रभु श्री बृहस्पति देव! आपकी सर्वदा जय हो, चित्त लगाकर मेरी यह विनीत प्रार्थना सुनिए। हे गुरुदेव! अब मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए जिससे भगवान के पावन चरणों में मेरी निष्काम भक्ति निरंतर बढ़ती रहे।

चौपाई

जयति जयति जय बृहस्पति देवा।

सकल मनोरथ पूरण सेवा॥

अर्थ: हे देवगुरु श्री बृहस्पति देव! आपकी सर्वदा जय हो, जय हो, जय हो! आपकी निष्काम सेवा और पावन आराधना साधक के समस्त शुभ मनोरथों को पूर्ण करने वाली है।

ज्ञान बुद्धि के तुम हो दाता।

सकल सृष्टि के तुम पितु माता॥

अर्थ: आप समस्त ज्ञान, प्रज्ञा, विद्या और सद्विवेक के परम दाता हैं तथा इस संपूर्ण चराचर सृष्टि के माता-पिता के समान पोषक, रक्षक और मार्गदर्शक हैं।

चारि भुजा अति शोभित रूपा।

मुकुट मनोहर भाल अनूपा॥

अर्थ: आपके अलौकिक दिव्य स्वरूप पर चार भुजाएं शोभायमान हैं; आपके मस्तक पर रत्नजड़ित मनोहर मुकुट और ललाट पर अनुपम तेज विराजमान है।

पीत वसन अति सुंदर धारा।

स्वर्ण कांति तन तेज उदारा॥

अर्थ: आपने अत्यंत मनोहारी पीले वस्त्र (पीतांबर) धारण किए हुए हैं, और आपका दिव्य शरीर तपे हुए स्वर्ण के समान तेजस्वी और कांतिवान है।

कर में जपमाला अति पावन।

पुस्तक कमंडलु मन भावन॥

अर्थ: आपके पावन कर-कमलों में पवित्र जपमाला, ज्ञान दायिनी वेद-पुस्तक, कमंडल और वरद-अभय मुद्रा अत्यंत मनमोहक लग रही है।

पद्म आसन पर प्रभु आसीना।

देव मुनीश चरण चित दीना॥

अर्थ: हे प्रभु! आप स्वर्ण कमल के पावन आसन पर विराजमान हैं, और समस्त देवता, इंद्र तथा श्रेष्ठ ऋषि-मुनि आपके चरणों में अपना चित्त लगाए रहते हैं।

देवगुरु तुम नाम तुम्हारा।

सुर नर मुनि सब करहिं जुहारा॥

अर्थ: आपका पावन नाम 'देवगुरु' (देवताओं के गुरु) है; समस्त देवता, गंधर्व, मनुष्य और ऋषिगण अत्यंत श्रद्धा से आपके चरणों में नमन और प्रणाम करते हैं।

विद्या बुद्धि विवेक विधाता।

धर्म कर्म के शुभ फल दाता॥

अर्थ: आप विद्या, बुद्धि और सद्विवेक के विधाता हैं तथा धर्म, नीति और सत्कर्म के मार्ग पर चलने वाले साधकों को शुभ फल प्रदान करते हैं।

जा पर कृपा तुम्हारी होई।

ता कहँ विघ्न रहे नहिं कोई॥

अर्थ: जिस साधक पर आपकी अहैतुकी कृपा दृष्टि हो जाती है, उसके जीवन में कोई भी विघ्न, बाधा, भय या संकट टिक नहीं पाता।

निर्धन हू धनवान बनावैं।

रोगी के सब रोग नशावैं॥

अर्थ: आपकी कृपा से निर्धन व्यक्ति भी ऐश्वर्य, वैभव और सात्विक धन प्राप्त करता है, और गंभीर रोगों से पीड़ित व्यक्ति भी स्वस्थ व नीरोग हो जाता है।

पुत्र हीन पावै सुत ज्ञानी।

विद्या पावै मति अज्ञानी॥

अर्थ: संतान सुख से वंचित दंपत्ति को तेजस्वी व गुणवान संतान प्राप्त होती है, और अज्ञानी व्यक्ति भी प्रखर विद्या और सद्ज्ञान प्राप्त करता है।

कुल दीपक सुत होहिं कुलीना।

ज्ञानवान अरु धर्म प्रवीना॥

अर्थ: आपके पावन आशीर्वाद से कुल का नाम रोशन करने वाला, सदाचारी, सुसंस्कृत, ज्ञानवान और धर्म में निपुण श्रेष्ठ पुत्र जन्म लेता है।

गुरु बिन ज्ञान मिलै नहिं देवा।

सब मिलि करहिं गुरु की सेवा॥

अर्थ: गुरुदेव की कृपा के बिना संसार में कभी सच्चा ज्ञान व मुक्ति नहीं मिल सकती; इसीलिए तीनों लोकों के समस्त प्राणी मिलकर गुरु की सेवा करते हैं।

तुम ही ब्रह्मा तुम ही विष्णु।

तुम ही शिव तुम ही त्रिभुवन पति॥

अर्थ: गुरु रूप में आप ही साक्षात् सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, पालनहार भगवान विष्णु और संहारक देवाधिदेव शिव हैं; आप ही तीनों लोकों के परम स्वामी हैं।

नवग्रह माहिं श्रेष्ठ पद पावा।

देवगुरु सब जग यश गावा॥

अर्थ: नवग्रहों के मंडल में आपको सर्वोपरि, सर्वाधिक शुभ और पूज्य 'देवगुरु' का पद प्राप्त है, और संपूर्ण ब्रह्मांड आपके पावन यश का गान करता है।

जो जन गुरुवार व्रत करई।

ताके संकट सब प्रभु हरई॥

अर्थ: जो भी श्रद्धालु गुरुवार (बृहस्पतिवार) के पावन व्रत और पूजन का निष्ठापूर्वक पालन करता है, प्रभु उसके जीवन के समस्त संकटों को हर लेते हैं।

चने की दाल अरु मुनक्का लीजै।

पीत पुष्प प्रभु अर्पण कीजै॥

अर्थ: गुरुवार की पूजा में भीगी चने की दाल, गुड़, मुनक्का, पीले पुष्प और पीला चंदन प्रभु को अत्यंत श्रद्धा व प्रेम के साथ अर्पित करना चाहिए।

पीत वस्त्र धरि ध्यान लगावै।

प्रेम सहित चालीसा गावै॥

अर्थ: साधक स्वयं स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करके एकाग्र मन से ध्यान लगाए और प्रेम व भक्तिभाव से इस पावन बृहस्पति चालीसा का सस्वर पाठ करे।

केला तरु तर पूजन करई।

दीपक घी का सम्मुख धरई॥

अर्थ: केले के पवित्र वृक्ष की जड़ में जल व हल्दी अर्पित कर विधिवत पूजन करें और प्रभु के सम्मुख शुद्ध गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें।

कथा सुने अरु पाठ सुनावै।

सो नर परम सुखों को पावै॥

अर्थ: जो गुरुवार की पावन व्रत कथा का श्रवण करता है और इस चालीसा का पाठ करता व दूसरों को सुनाता है, वह संसार के परम सुखों को प्राप्त करता है।

विवाह बाधा दूर परावै।

सुंदर योग्य सुवर को पावै॥

अर्थ: विवाह में आ रहे समस्त विलंब, अड़चनें और गुरु दोष दूर हो जाते हैं, और कन्या को सुयोग्य, संस्कारवान वर व अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

कन्या पावै पति मनमाना।

घर-परिवार बसै सुख धाना॥

अर्थ: कन्या को मनवांछित उत्तम जीवनसाथी प्राप्त होता है और उसका वैवाहिक जीवन सुख, शांति, प्रेम और समृद्धि का पावन धाम बन जाता है।

व्यापारहिं नित लाभ बढ़ावैं।

यश कीर्ति चहुं दिशि फैलावैं॥

अर्थ: नौकरी, आजीविका और व्यापार में निरंतर उन्नति व आर्थिक लाभ होता है तथा चारों दिशाओं में साधक के मान-सम्मान और यश का विस्तार होता है।

उच्च पदवी मान दिलावैं।

शत्रु दमन करि विजय करावैं॥

अर्थ: उच्च प्रशासनिक पद, समाज में प्रतिष्ठा और बौद्धिक नेतृत्व प्राप्त होता है तथा समस्त विरोधी व ईर्ष्यालु शांत होकर परास्त होते हैं।

गुरु दोष सब शांत कराई।

सुख संपत्ति घर माहिं समाई॥

अर्थ: जन्मकुंडली में स्थित अशुभ गुरु दोष, चांडाल दोष या निर्बल बृहस्पति का प्रभाव शांत हो जाता है और घर में सुख-समृद्धि का स्थायी वास होता है।

कंचन काया सुंदर देहा।

उपजै प्रभु पद निर्मल स्नेहा॥

अर्थ: साधक को निरोगी काया, तेजस्वी देह और उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त होता है, और उसके अंतःकरण में प्रभु के पावन चरणों के प्रति निष्काम प्रेम उपजता है।

वेद पुराण स्मृति सब गावा।

गुरु महिमा को पार न पावा॥

अर्थ: चारों वेद, अठारह पुराण और समस्त धर्मशास्त्र गुरुदेव की अगाध महिमा का गान करते हैं, किंतु उनके अपार गुणों का कोई पार नहीं पा सकता।

इंद्र सहित सब देव पुकारा।

जब जब दानव कियो संहारा॥

अर्थ: जब-जब आसुरी शक्तियों और दानवों ने स्वर्ग व धर्म पर संकट उत्पन्न किया, तब-तब देवराज इंद्र सहित समस्त देवताओं ने आपकी शरण में पुकार लगाई।

नीति विवेक उपाय बताई।

देवन को प्रभु विजय कराई॥

अर्थ: तब आपने अपनी अद्वितीय नीति, प्रज्ञा, विवेक और सही युक्ति बताकर देवताओं का मार्गदर्शन किया और उन्हें महादानवों पर विजय दिलाई।

अमृत रूपी वचन सुनावैं।

देव मुदित ह्वै शीश नवावैं॥

अर्थ: आपके अमृतमयी ज्ञान उपदेशों को सुनकर समस्त देवता आनंदित हो जाते हैं और आपके पावन चरणों में कृतज्ञतापूर्वक शीश नवाते हैं।

अंगिरा ऋषि कुल जन्म तुम्हारा।

मातु श्रद्धा कुल कियो उज्यारा॥

अर्थ: आपने परम तपस्वी महर्षि अंगिरा के पावन कुल में माता श्रद्धा के गर्भ से अवतार लेकर समस्त ऋषि कुल को आलोकित किया।

तारा पति प्रभु परम पुनीता।

भक्तन के हित सदा प्रमीता॥

अर्थ: हे देवी तारा के स्वामी और परम पवित्र देवगुरु! आप अपने शरणागत भक्तों के कल्याण और आत्मिक उत्थान के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।

कच को दीनी विद्या भारी।

संजीवनी जो अति सुखकारी॥

अर्थ: आपने अपने प्रिय शिष्य व पुत्र कच को उच्च ज्ञान और धर्मनिष्ठा की शिक्षा देकर देवकुल की रक्षा का मार्ग प्रशस्त किया।

ज्ञान प्रकाश हृदय में भरियो।

अज्ञान का तिमिर सब हरियो॥

अर्थ: हे दयालु गुरुदेव! मेरे हृदय में सत्य और आत्मज्ञान का दिव्य प्रकाश भर दीजिए और अज्ञान, भ्रम व मोह के घोर अंधकार को नष्ट कर दीजिए।

शरण गहे की लाज निभाओ।

संकट विकट तुरंत मिटाओ॥

अर्थ: मैं आपकी पावन शरण में आया हूँ, अपने दीन भक्त की लाज रखिए और मेरे जीवन के समस्त विकट संकटों और चिंताओं का तुरंत निवारण कीजिए।

जो कोई पढ़े प्रेम चित लाई।

ताके काज सिद्ध ह्वै जाई॥

अर्थ: जो भी मनुष्य प्रेम और एकाग्र चित्त से इस चालीसा का नित्य पाठ करता है, उसके जीवन के समस्त रुके हुए और कठिन कार्य सहज ही सिद्ध हो जाते हैं।

नित प्रति पाठ करे मन लाई।

सो नर भव सागर तर जाई॥

अर्थ: जो नियमपूर्वक प्रतिदिन इस पावन चालीसा का श्रद्धा से पाठ करता है, वह इस कठिन भवसागर के जन्म-मरण के बंधनों से सहज ही पार उतर जाता है।

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावै।

गुरुदेव को शीश नवावै॥

अर्थ: जो साधक भक्तिपूर्वक सुगंधित धूप, दीप और पीला नैवेद्य अर्पित करके देवगुरु बृहस्पति के चरणों में श्रद्धापूर्वक शीश झुकाता है;

ताके घर नित मंगल होई।

दुख दारिद्र रहे नहिं कोई॥

अर्थ: उसके घर में नित्य नए मांगलिक कार्यों, सुख, शांति और खुशहाली का वास होता है, और किसी प्रकार का दुख या दरिद्रता शेष नहीं रहती।

देवगुरु की कृपा अपारा।

जयति जयति प्रभु तारणहारा॥

अर्थ: देवगुरु बृहस्पति जी की कृपा असीम, अलौकिक और अपरंपार है; हे भवसागर से पार उतारने वाले तारणहार प्रभु! आपकी सर्वदा जय हो, जय हो!

समापन दोहा

बृहस्पति चालीसा विमल, जो नर पाठ करंत।

ज्ञान विवेक अरु सुख लहै, कृपा करहिं भगवंत॥

अर्थ: जो भी मनुष्य इस निर्मल और पावन श्री बृहस्पति चालीसा का नित्य पाठ करता है, वह श्रेष्ठ ज्ञान, सद्विवेक और संपूर्ण सांसारिक सुख प्राप्त करता है तथा उस पर साक्षात् भगवान और देवगुरु की असीम कृपा बरसती है।

श्री बृहस्पति देव चालीसा का महत्व एवं परिचय

सनातन धर्म और ज्योतिष शास्त्र में देवगुरु बृहस्पति (Lord Brihaspati) को समस्त देवताओं के पूज्य गुरु, प्रज्ञा के स्वामी और नवग्रहों में सबसे शुभ व कल्याणकारी ग्रह माना गया है। वे महर्षि अंगिरा के पुत्र हैं और ज्ञान, धर्म, सद्विवेक, उच्च शिक्षा, दांपत्य सुख तथा सात्विक समृद्धि के प्रत्यक्ष अधिष्ठाता हैं।

बृहस्पति चालीसा (Brihaspati Chalisa) देवगुरु के पावन स्वरूप, दिव्य शस्त्रों, पीतांबर छवि और उनकी असीम कृपा का गुणगान करने वाली ४० चौपाइयों की एक अत्यंत शक्तिशाली स्तुति है। जब-जब देवताओं पर संकट आया, तब-तब गुरुदेव ने अपनी अद्वितीय नीति और दिव्य विवेक से देवताओं का मार्गदर्शन कर धर्म की रक्षा की।

शास्त्रों के अनुसार, जिस व्यक्ति की कुंडली में गुरु ग्रह शुभ और बलवान होता है, उसे समाज में अगाध मान-सम्मान, उत्तम पद, सद्बुद्धि, सुखी दांपत्य जीवन और दीर्घायु की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत, यदि गुरु ग्रह कमजोर या दूषित हो, तो जातक को शिक्षा में बाधा, विवाह में विलंब और आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में श्री बृहस्पति चालीसा का नियमित पाठ रामबाण उपाय सिद्ध होता है।

श्री बृहस्पति चालीसा पाठ करने की सही विधि एवं नियम

श्री बृहस्पति चालीसा का संपूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित प्रामाणिक विधि और नियमों का पालन करें:

  1. शुभ दिन एवं संकल्प: शुक्ल पक्ष के किसी भी गुरुवार से पाठ आरंभ करें। लगातार ११, १६ या २१ गुरुवार तक पाठ करने का संकल्प लें।
  2. स्नान एवं पीले वस्त्र: प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें। इस दिन पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  3. केले के वृक्ष का पूजन: पूजा स्थल पर भगवान विष्णु अथवा देवगुरु बृहस्पति की प्रतिमा स्थापित करें। यदि संभव हो, तो घर के समीप स्थित केले के वृक्ष की जड़ में जल, कच्चा दूध, हल्दी और चने की दाल अर्पित करें।
  4. दीप एवं भोग अर्पण: शुद्ध गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें। गुरुदेव को पीला चंदन लगाएं, पीले पुष्प अर्पित करें तथा चने की दाल, गुड़, मुनक्का अथवा बेसन के लड्डुओं का भोग लगाएं।
  5. भावपूर्ण पाठ: शांत चित्त होकर पहले दोनों प्रारंभिक दोहे, फिर चालीस चौपाइयाँ और अंत में समापन दोहे का पाठ करें। प्रत्येक चौपाई का सरल अर्थ मन में दोहराते हुए पाठ करें।
  6. आरती एवं क्षमा प्रार्थना: पाठ के उपरांत ‘ॐ बृं बृहस्पतये नमः’ अथवा ‘ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः’ मंत्र का १०८ बार जप करें और गुरुदेव की पावन आरती उतारें।

श्री बृहस्पति चालीसा पाठ के अद्भुत लाभ एवं महत्व

बृहस्पति चालीसा का नित्य पाठ साधक के जीवन में चमत्कारी आध्यात्मिक और भौतिक परिवर्तन लाता है:

  • विवाह बाधा एवं गुरु दोष निवारण: “विवाह बाधा दूर परावै, सुंदर योग्य सुवर को पावै” — कन्याओं व युवकों के विवाह में आ रहे अनुचित विलंब, मंगली या गुरु दोष समाप्त होते हैं और सुयोग्य जीवनसाथी मिलता है।
  • विद्या, बुद्धि और परीक्षा में सफलता: “विद्या बुद्धि विवेक विधाता, धर्म कर्म के शुभ फल दाता” — विद्यार्थियों की एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ती है तथा उच्च शिक्षा व प्रतियोगी परीक्षाओं में श्रेष्ठ परिणाम मिलते हैं।
  • आर्थिक समृद्धि एवं व्यापार में लाभ: “व्यापारहिं नित लाभ बढ़ावैं, यश कीर्ति चहुं दिशि फैलावैं” — व्यापार और आजीविका में आ रहे अवरोध दूर होते हैं और स्थायी धन-वैभव की प्राप्ति होती है।
  • सुयोग्य संतान की प्राप्ति: “पुत्र हीन पावै सुत ज्ञानी, कुल दीपक सुत होहिं कुलीना” — संतानहीन दंपत्तियों को सदाचारी, प्रखर और कुल का नाम रोशन करने वाली संतान का सुख प्राप्त होता है।
  • मानसिक शांति और सात्विक विचार: गुरुदेव की कृपा से मन के संशय, अज्ञान और अवसाद का नाश होता है तथा अंतःकरण में धर्म और सत्य का प्रकाश फैलता है।

श्री बृहस्पति देव जी के अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)

देवगुरु श्री बृहस्पति जी की संपूर्ण कृपा प्राप्ति हेतु इन पवित्र पाठों का भी नित्य पाठ करें:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र.बृहस्पति चालीसा का पाठ किस दिन और समय करना सबसे उत्तम होता है?

बृहस्पति चालीसा का पाठ करने के लिए गुरुवार (बृहस्पतिवार) का दिन और प्रातःकाल सूर्योदय का समय (ब्रह्म मुहूर्त) सर्वश्रेष्ठ है। शुक्ल पक्ष के किसी भी गुरुवार से यह पाठ आरंभ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

प्र.विवाह में आ रही रुकावटों को दूर करने के लिए बृहस्पति चालीसा का पाठ कैसे करें?

लगातार 16 गुरुवार तक पीले वस्त्र धारण करके, केले के वृक्ष की जड़ में जल व हल्दी अर्पित करते हुए शुद्ध घी का दीपक जलाएं और 3 बार बृहस्पति चालीसा का पाठ करें। इससे कुंडली का गुरु दोष शांत होता है और शीघ्र विवाह के योग बनते हैं।

प्र.भगवान बृहस्पति (गुरुदेव) को पूजा में क्या-क्या अर्पित करना चाहिए?

देवगुरु बृहस्पति को पीला रंग अति प्रिय है। पूजा में भीगी हुई चने की दाल, गुड़, मुनक्का, पीले पुष्प (गेंदा या कनेर), पीला चंदन, हल्दी और बेसन के लड्डू या केसरिया हलवे का भोग अर्पित करना चाहिए।

प्र.क्या विद्यार्थी भी बृहस्पति चालीसा का पाठ कर सकते हैं?

हाँ, देवगुरु बृहस्पति ज्ञान, उच्च शिक्षा, प्रज्ञा और स्मृति के अधिष्ठाता ग्रह हैं। विद्यार्थियों द्वारा नित्य बृहस्पति चालीसा का पाठ करने से एकाग्रता बढ़ती है, अध्ययन में रुचि जाग्रत होती है और प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त होती है।

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